१.
ताड़ की झाड़
आकाश मेरा;
ताड़ पर ही अटका
न गिरा न चढ़ा
धरती औ आकाश
दोनों नहीं मेरे !
२.
किरकिर कंकड़
अनाम अरूप
अव्यवस्थित
ठोस !
स्वीकार्य/मैं/नहीं
तरल जो कभी;
केवल चक्षु कोनो पर फंसे
जल सा
न आंसू
न हया
तरल जो कभी;
अनाद्रित
मैं!
१. कमाल है कि तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...
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