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Sunday, December 21, 2014

नींद नहीं आती ख्वाब आते रहे दिन औ रात।

१. 
कब्रगाहों में दफ्न 
आशाओं के तेवर,
कुंडली मार छिप गयीं 
योजनाएं ख़ुशी की,
और काई पर फिसल गई 
तेरी हँसी 
बेतरतीब बिला वज़ह ख्वाब दर ख्वाब आती रहती है। 
परत दर परत जमते जाते हैं मुझ पर ख्वाब मेरे। 

२. 

नींद नहीं आती 
ख्वाब आते रहे दिन औ रात। 

३. 

देखी बचपन में भूली भूली भुतहा फिल्मो सी 
पता नहीं ख्वाब है या खुद मैं। 

Sunday, April 21, 2013

एक दिन और

१. 

एक दिन और 
पुनः एक दिन 

ज़िन्दगी खींच रहा।

एक दिन और, 
कोई तोहमत न आए तुझपर।

२. 

तुम्हे शिकायत है,
चाल चलन से मेरे।

मुझे पता है,
तुम्हे मेरी आदत नहीं।

३. 

इंतज़ार है मुझको 
तेरे लिए, या तुझको भी

बंद कर दोगे तुम 
प्यार मुझसे।

मुक्त मुझसे, मिले
तुझे धरती, आकाश तेरा। 



Tuesday, February 26, 2013


 १. 

धरती है आग गोला,
हरियाली में छिपती।
मैं नहीं धरती जैसा . 

२. 

संगीत तुमको,
छेद छेद हुआ मैं।
बांसुरी बन . 

३. 

चुप हूँ,
सुन रहा।
जो नहीं भी मेरा .

४. 

उसने  सही अपनी,
तुमने सही अपनी।
सह रहा मैं किसकी .


Monday, October 29, 2012

झाड झंखाड़ स्वप्न एक -- पार्ट टू

ख्वाब छलता हुआ,
चला आता है 
नींद झंझोड़े। 

बिखर जाने की, एक और परत बनती है
सोता जाता हूँ 
औ 
ख्वाब उगे आते हैं कन्धों से 
ख्वाब; पथरीले, लम्बे डैनों, नुकीले पंजों से 
नोच डालें हैं 
नींद मेरी,
मरती है धीमी मौत।

जलती आँखों 
ज़िन्दगी को निहारता मैं 
न हसरत, न लालसा कोई 
ख्वाब क़त्ल करते 
मेरा 
आहिस्ता आहिस्ता    


Tuesday, October 16, 2012

काटता है वक़्त

मनहूस मई  रात
खुद को मरा पाया उसने
हर रोज़,झखझोर खुद को देख लेता है
और रोज़ ही,
खुद को मरा पाता है,
काटता है वक़्त,
मौत को गिनते, बार बार  मारता है
हर बार ही, खुद को .

Thursday, October 4, 2012

झाड झंखाड़ स्वप्न एक .....01

उजाला बढ़ गया 
कल नींद साथ लाई,उजाला  
घनघोर उजाला
चमकदार, सफ़ेद, उजला, उजाला।
तुम पर साथ आ गए जैसे 
तुम आ ही गए साथ पर 
'आ गए जैसे' जैसी बात नहीं 
जैसे भरम हो मेरा 
तुम्हारे साथ ही आई एक परछाई, जैसे
 'जैसे ' कहना वाजिब है 
[न मेरे भरम का पता पक्का , न तेरे साथ की परछाई का ]
जैसे भरम हो मेरा ,तुम्हारे साथ ही,आई एक परछाई,जैसे 
लग पड़ी तुम गले मेरे,

और मै जलने लगा 

जलन से मेरे , जल न पाई परछाई 
अपने खुद से ढक रखा
छुपा रखा खुद से भी तुमने, परछाई 

चिपक  गई है तुमसे परछाई
नहीं कोई काम, मुझे परछाई से 
तुम  भी तो कहते हो, नहीं कोई काम तुमको, परछाई से 
पता नहीं मुझको
जगता कि सोता हूँ, खुद को ही छलता हूँ
देख देख खुद को ही,
जलता  दहकता हूँ
देख देख खुद को ही, हँसता हूँ,  हँसता हूँ 
अट्टहास 
हँसता हूँ 
हहाकर हँसता हूँ 
जलते हुए मुरख पर हंस कर बरसता हूँ 
हा हा हा हँसता हूँ 
झिम झिम बरसता हूँ,
भीगता नहीं हूँ 
तुम भीगते हो
नहीं भीगती है परछाई 

जलता बरसता हूँ 
हँसता हूँ 
अट्टहास 
    

Friday, December 30, 2011

१.

दीवाल सा कुछ,
भरभरा,निरंतर रोके हुए!
खुद सपने अपने   
ले ले भागूं जब.

टूट रहे भ्रम मेरे
याकि,
सपनो में दगा, ख्वाब देते जाते......  

२.

मन के किनारों पर 
अक्सर,
दुःख के सीपी चुनते 
हंसी की चंद फुहारें
मोती बन लुप्त होते 

ख्वाब मेरे अपने,
सहते नहीं मनमानी मेरी..  
 

Thursday, July 21, 2011

poems of delirium -6.

क्या पहना होगा 
तुमने 
पैरों में,
मेरी किरिच पे चलते हुए... 

Thursday, July 14, 2011

ज़िन्दगी ठहरी है टूटे धागे पर.



सफ़ेद
झक्क सफ़ेद खादी सी 
जिंदगी, 
बुन रहा था, 
समतल पठार सा 
सफेदी में सदा रंगा.

ध्यान भटका 
धोखा निगाहों को
रंगीन 
रेशम उलझ गया हाथ 
रिश्ता बुनना चाहा मैंने .

सतर टूट गयी 
लय टुटा 
रुक गया बुनना 
थम गया जीवन .

तुमने कहा  
बांध 
आगे बढ़ो   
टूट जाए  जो 
जोड़ लो उसको  
छिपा गाँठ 
मन के कोने 
टूटे रिश्तों को कर लो अपना   

बाँध कर देखा, 

एक ही गाँठ  
छिप न पायी 
मेरे चादर,
एक टुटा हुआ रिश्ता  
न निभा मुझसे 

खोल देता हूँ  
गाँठ 
मन पे पड़ी 
जोड़ता नहीं टुटा धागा 
छोड़ देता हूँ बुनना

ज़िन्दगी ठहरी है 
टूटे धागे पर. 


 


अधुरा किया खुद को .

रेशा रेशा 

रंग
उघाड़ता रहा,

बेरंग कर 
कहानी में, फिट करना चाहा,

कुछ दिन लिखी 
कहानी, मैंने
अधुरा किया खुद को .

कहानी, अधूरी  
रेशा रेशा  
उघाडती
अब, मुझको 

एक अरसा हुआ, नींद नहीं आई मुझको .

दिन, 
ख़ुदकुशी कर लेता है
रात ढलती नहीं 
उजाला नहीं होता,

तमाम तह 
बिछा 
संजोये अपने टुकड़े
ज़िन्दगी
क़त्ल रोज़ करती रही 

खौफ  
स्याप अंधेरों में नहीं सोने देता  

एक अरसा हुआ,
नींद नहीं आई 
मुझको . 

Wednesday, July 13, 2011

poems of delirium-5


ख़ामोशी पसरी 
सन्नाटा बिछा,
आती नहीं 
मुझ तक 
मेरी चिंखें, गूंगी 
मौत घटता नहीं क्यूँ 
सहसा  

poems of delirium-4

उठ बैठी..


गिनने लगती है पोरों पर समय,
नहीं
मरने का समय नहीं आया,
हिसाब कहता है .

लाश उठ बैठी 
समय सवार है 
गर्दन पर मेरे  

Tuesday, July 12, 2011

poems of delirium - 3

झुक
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को, 
थक गए थे कंधे - मुर्दा उम्मीदों को वहन करते ;
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को,
लाश फिसल गयी मेरे हाथों से
थक गए थे हाथ - अपने शव संस्कारों में ;
लाश पर 
अपनी 
नाचता रहा - नाचता रहा - नाचता रहा 
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को 
झुक 
कंधें आ गए मेरे हाथों में 
अपने हाथों
ढोता हूँ - अपने कंधे - अपनी लाशें  

poems of delirium-2

स्मरण नहीं,
बाज़ी  हममें, 
स्मरण नहीं 
कबसे चलती हुई

मेरा दांव भी      
मेरा जीवन
मेरा जीवन 
तुमने रखा है दांव, 
स्मरण नहीं, 
कबसे चलती हुई बाज़ी हममें .

रात जलती हुई-सुलगती हुई 
धुआं धुंआ रहता है दिन .

कुंद सिरे नाखून 
टूटे पंख घिसे दांत 
बुझे बुझे बोझिल डैने

कुरेद कुरेद खोद नोंच 
खुद को, 
याद से खुद को 
भूत से खुद को,

स्मरण नहीं द्वन्द कबसे चलता हुआ
स्मरण नहीं बाज़ी कबसे चलती हुई,
मेरा दांव मेरा जीवन
मेरे जीवन पर ही दांव तेरा

स्मरण नहीं कबसे मैं जलता हुआ....

Monday, July 11, 2011

देश तुमको प्यार नहीं करता / अब

बंद कर देता हूँ ,
देश तुमको  प्यार नहीं करता 
अब .

जिसे चाहो जी जान 
उसका खंज़र रहता है  
अदृश्य 
बच के रहता हूँ हिमालय से  
डरा रहता हूँ सिंध तुमसे 
बंद कर देता हूँ  
देश तुमको प्यार नहीं करता  
अब  

१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...