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Friday, August 22, 2014

वक़्त

1.

वक़्त का एक मोड़ ऐसा भी 
परे जिसके, 

इंतज़ार बचता है वक़्त ख़त्म होने का। 


2.


न अनादि है न अनंत समय का विस्तार। 
भ्रम भर,
ख़त्म हो जाता है, शुरुआत के अनन्तर ही। 



3.

(अ)काल नहीं धरता रूप, भूत या वर्तमान।

भविष्यत् काल,
कुछ नहीं, बस मन की उड़ान। 

Tuesday, July 22, 2014

अशेष नहीं, समय भी....

१.

अशेष नहीं, समय भी।  
ख़त्म हो,
वक़्त भी।

२.

न  पहले कुछ। 
न  बाद कुछ
मुझ तक, सिमटा समय।

३.

घूम फिर वहीं लौटे। 
नहीं कुछ और 
ज़िन्दगी का मक़सद, ज़िन्दगी।  






Saturday, May 17, 2014

कोई शीर्षक नहीं

1.

रिंग में मास्टर, बाहर शेर 
नए तमाशे ऐसे ही,
नकली मास्टर नकली शेर .

2.

बहुत तेज़ हवा है
आँचल बेहतर होता,
घर का दिया न बुझे, खुद के सैलाब में.

3.

आप वाकिफ हैं, है हमें भी पता 
जश्न में जले हैं 
अपने ही आशियाने भी .




Sunday, May 29, 2011

मैं भूत

"छठी कक्षा थी

शायद

अनुवाद से पहले

पाठ था

काल का .




कल प्यार था

आज प्यार है

प्यार रहेगा हरदम.




वाक्य नहीं बना पाता था

मेरा

भूत औ भविष्य.




वर्तमान, ही

की

संरचना




कुत्ता मरता है

मै रोता हूँ

तुम निष्ठुर हो .




इतने साल बीते

भविष्य नहीं बनता

प्यार रहेगा हरदम ???





वर्तमान हुआ भूत

भूत मुझमें अटका




मैं मरता हूँ

कुत्ता रोता है

तुम निष्ठुर हो .




मैं भूत

नहीं, वर्तमान

नहीं, भविष्य ."

Tuesday, May 17, 2011

समय

१-

ढल गया
ओस कतरन-सा 
समय 
हो संघनित
हो गया है ख़त्म
बिना छाप छोड़े अपनी

२-
समय  का एकायाम
इंतेज़ार
समय से परे 
मिलाप !

३-
रेल मुसाफिर सा
स्थिर, फिर भी विस्थापित
अक्सर आउटर पर खड़ा 
इंतज़ार बारी का
भागते पेड़ 
खिड़की से परे
वस्तुतः खड़े है वही
जैसे 
समय / गतिहीन सदा  


Monday, May 16, 2011

समय पर तीन कवितायेँ और...

३.

तुम बुनते रहे

सीख सीना
सिलें हैं मैंने
कई कोने !
समय को बना
गठ्ठर-सा
घुमती हूँ मै
पीठ  पर लादे

तुम बुनते रहे
समय के धागे
स्वीटर-सा
सीने से चिपका
तुमने पहन रखा है समय.

किसी घूरे पर फेंक
समय गठरी
मैं हो जाऊं हल्का
बदले मौसम में
तुम सहते रहो
समय की तपिश

Sunday, May 15, 2011

समय पर तीन कवितायेँ और.....

२-
सभी संभव, असंभव 
जोड़ता हूँ
समय से!

होनी के तमाम कोने
होने का नाभिक
नहीं  का भार
वजूद का हल्कापन
जोड़ता हूँ समय से!

मैं अघटित /
घटता है समय

Saturday, May 14, 2011

समय---तीन कवितायेँ और..!

१-
करता नट-क्रिया
समय,

नौशिखिया सा !

बाँध मन 
दो छोरों  पर
मै दर्शक हूँ
बिगड़ी ताल
साधते समय का!

विजड़ित मै
तनित मन
डगमगाता समय
मूल्य हीन नहीं,ये 
मनोरंजन! 



Wednesday, May 11, 2011

कत्ल हो गया है उम्र का

समय नहीं चक्रीय

वर्तमान;
भूत भी
चंद खंडो में कटा 
रेखीय टुकड़ा है

समय 
स्थगित है
कटे किनारों के मध्य

कत्ल हो गया है उम्र का


मसीहा

१. कमाल है कि  तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं  सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि  मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...