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Wednesday, January 6, 2021

 1.

भूगोल की किताब में लिखी हो शायद 

उम्र 

नदियों की 

बहते झरनों की,

लिखा हो शायद 

कौन युवा प्रौढ़ कौन, कौन मुग्धा.

समाज शास्त्र नहीं लिखता लेकिन 

लड़कियाँ जी रही होतीं हर अवस्था .


2.

खिले, अधखिले, अनखिले फूलों से 

चिड़िया से 

गंध से या स्वाद से 

तुलना बेमानी है, 

अर्थहीन हैं कविताएं. 


लड़कियों खुद उपमेय निज उपमान. 


3.

नदी, नदी है 

लडकियां, लडकियां 

नदी देख फिर भी याद आती हैं वह तमाम लडकियां 

जिनके भूगोल की किताब तक सिमटा है 

जीवन का अर्थशास्त्र.

Monday, July 15, 2013

एक मित्र की कहानी का रूपांतरण

बर्फ पड़ती रही,
लगातार, बाहर 
बर्फ जमती रही,
अनवरत,
अन्दर।

सफ़ेद सड़को पर 
पसरी वीरानी 
दबे पांव 
घेर लेती है खालीपन मन का।
और तुम्हारा जाते जाना 
साथ रहना 
पास आस होना।

जमी बर्फ पिघला देती 
कुछ बिसरे फाग,
चंद रवींद्र गान।
सफ़ेद बर्फ झूठला देती 
कसौनी की शाम,
अनुराग के बासंती छींटें।

सफ़ेद बर्फ में,
दफना देती मैं 
अपनी नदी।
तुझतक मिलने तक 
बहती रही,
केवल तुझ तक ................

Wednesday, July 6, 2011

ताउम्र नफरत

नफरत,  
शिद्दत से 
कर पाते हो 
तुम 
हमसे
बेपनाह मुह्हबत की 
इज़ाज़त दी हमनें 

प्यार मानती हूँ 
 नफरत में 
ताउम्र नफरत ही रखो 
हमसे... 

Monday, May 30, 2011

प्रथम प्रेम पत्र

आदिम औरत की तरह  
ही हो सकता है
प्रथम प्रेम-पत्र मेरा .

बिना किसी हिचक
कह देना 
तुमने 
बर्बाद किया है  मुझे
पाप का फल दिया 
जूठा कर दिया है मुझे

धरती से बाँध
स्वर्ग मेरे गिर्द रचा
तुमने छुआ भी नहीं
मुझे कर दिया मिट्टी .

आदिम औरत की तरह
प्रथम प्रेम-पत्र मेरा
बिना हिचक कहेगा
मुक्त मुझे, बाँध

तुम हो हत्यारे .

आदिम औरत की तरह
प्रथम प्रेम-पत्र मेरा
तब लिखा जायेगा 
जब
प्रेम ख़त्म हो जायेगा 
आदिम पुरुष की तरह
तुम बसा लोगे नयी बस्ती  .

आदिम औरत की तरह 
प्रथम प्रेम पत्र मेरा
होगा
रूदन की गाथा
स्वत्व नष्ट होने की व्यथा
प्रेम हिंषा की कथा

आदिम औरत की तरह 
प्रथम प्रेम-पत्र मेरा 
प्रेम को लेकर
आखिरी अभिव्यक्ति होगी मेरी .








Monday, May 2, 2011

मुझे प्रिय है /मेरे खिलोने !

न्यून की आदत है तुम्हे
तुम्हे पसंद है
कम-कमतर
खालीपन-खुलापन

मै संजोती हूँ
हर क्षण

जीवन का हर कोना,
दीवाल का रूखापन,
खालीपन मन का,
सजा के रखती हु मै.

खेल के स्पेश परे
खिलोने टूट भी,सजाते है जीवन
मुझे प्रिय है
मेरे खिलोने !

तुम जीते हो न्यून
खालीपन-खुलापन

मित्र मेरे!
नहीं रह सकते हम
एक छत तले

Saturday, April 30, 2011

तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

प्यार होता है कोमल

इतना कि
पनपता है एक बार बस
सूख वा टूट जाता है खिलवाड़ से 


तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

मुझे पसंद है 
प्यार को पनपने देना 
अछूते कोनो को झंकृत करना
मुझे पसंद है तोड़ देना कोमल प्यार 

तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

कत्ल के कई इल्जाम है संवेदनाओ के 
मांगती हु मै स्थायित्व 
अंत से संबंधो के

मेरे मित्र 
तुम्हारी बात हो सकती है सच भी
मैंने नहीं कभी किया प्रेम
मेरे मित्र सच हो सकती है तुम्हारी बात भी

मैंने चाहा हमेशा 
करे न कोई प्यार कभी मुझे
प्रेम में सवांरते हो तुम केवल कोमलपन
तेरी भावना भर पाती है पोषण
सींचते  हो तुम ही ह्रदय का नम्र कोना

करते हो जब जब तुम प्रेम मुझे 
मै नहीं तुम ही होते हो निज दुनिया की धुरी

मेरे मित्र 
खिलवाड़ से सूखे/टूटे प्रेमोपरांत
बन पाते हो 
मेरे सखा 

मै चाहती हु 
तुमसे
तुमसे पहले कोई 
उससे पहले कोई












Friday, April 29, 2011

मै नहीं सह सकती/प्रेम विवाह

मै नहीं सह सकती
प्रेम विवाह

प्रेम देता है मुक्ति
बहने देता है
मेरे अन्दर की नदी
खुद तलाशे रास्तो पर

प्रेम के गोतों में
साथी रहते है मुक्त

क्रीडा सहचर-से मुक्त हम !

मुक्त प्रेम है मुक्ति मेरी

बांधता है विवाह

किनारों से बंधना हो नियति
तो
बंधने दो रीति से, रिवाजों से!

प्रेम विवाह
नहीं सह सकती मै

Thursday, April 28, 2011

नहीं चाह सकती तुम्हे/मन ओ मस्तिष्क से

मै एक नहीं !
मन ओ मस्तिष्क बांटता है मुझे.

मन ले जाता है
मुझे मेरे आदिम तक
सुन्दर बलिष्ठ विजेता...
नारी मन मेरा चाहे
जीत कर हासिल  करे
मुझे मेरा पुरुष

सभ्यता देती है मन को कई तह
कई तह मन के
चाहे पुरुष कई

मस्तिष्क  है पसंद मेरी

मन नहीं देखता  ज़रुरतो की लिस्ट
चाहे मस्तिष्क तुम्हे
तुम दे सकते हो नाम/धाम
मिलती है सुरक्षा 

मन चाहे तो  बेकाबू हो सकता है कभी कभी  
आवरण में !

मुझे पता है
नहीं चाह सकती तुम्हे
मन ओ मस्तिष्क से

न किसी और को





Wednesday, April 27, 2011

मै नहीं था लायक/जान पाता सच

तुम धरा हो

मेह के नेह से भीगे
तुम्हारे अंतर में
हलचल है नुकीले हल की भी
तुमसे पनपी है यह बाजरे  की फसल !

मै नहीं था लायक
जान पाता सच

जान पता/ बीज भर नहीं है अवयव
सृज़न को चाहिए तुम्हे
बीज के साथ हल ओ जल भी !
तुम धरा हो

मै नहीं था लायक
जान पाता सच....

Tuesday, April 26, 2011

माँगा तुमने था थोड़ी बारिश

sतुमने मांगी थोड़ी मिट्टी
कोई सौप गया सारी धरती

चाहा तुमने थोड़ी हवा 
कोई दे गया अपनी साँसे

जीवन के अनंत में 
तुम्ही बने किसी का अम्बर

हो तुम खुद अग्नि धर्मा
हवि तुम्हारी है भावना सबकी

माँगा तुमने था थोड़ी बारिश
तम्हारे हो गए मेरे  सावन

तुम हो गए पूरे
रह गए हम सब  रीते  

Wednesday, April 20, 2011

कहा मैंने

बाँध के नहीं रख सकते मुझे
बँध के नहीं रहना मुझे.
युधिष्ठिर मैंने तो नहीं बाँधा तुम्हे

कृष्ण रहे सदा ही मेरे साथ
मेरे सखा, मेरे प्रिय की छाया
कृष्णा हूँ मै कृष्ण के ही नाते

पंचतत्व / पञ्च पतित्व
आधार है मेरे जीवन के
अलग अलग नहीं
एक साथ

बाँध नहीं सकते तुम
समय पर धर्म-रेखा

जी सकते हो भला
प्रथम वर्ष केवल जल पर
अगले साल केवल वायु

नाम दिया है तुमने
हक तुम्हारा भी है
मैंने माना ही सदा
दी तुमको इज्ज़त इस नाम की खातिर

नाम ही तो सब कुछ नहीं 'युधि'
तुम छिपा ले जाते हो
नपुंसत्व अपने सत्याचरण के सहारे
तुम्हारा सत्य नहीं देता मुझे संबल
तुम्हारा हो जीवनाधार !
तुम्हारे जीवनाधार से नहीं बाँध सकती मै अपनी नाव

तुम देते हो मुझे नाम
नाम से प्रिय है मुझे मेरा मै

तुम धर्मावतार हो
मै अग्निकन्या युधि
मेरी जीवनाग्नी को चाहिए
एकाधिक अर्जुन
बेध सके मुझको
बाँध ले मेरा प्रवाह
मेरे स्नेह को चाहिए पात्र नकुल/सहदेव का


तुम्हे प्रिय है सत्य तो सुनो युधि
कर्ण है मेरा प्रतिजीवन
अर्जुन और कर्ण
इन्ही के बीच हो सकता है बंटवारा

अर्जुन ने पा ली है मेरी देह
अर्जुन प्राप्य है मेरा
कर्ण प्रेय रहा है सदा
अगठित,कठिन कर्ण है/आकर्षण की धुरी
पुरुष रूप में प्रिय है मुझे कर्ण
सदा से/ अब भी

भोग मुझे अर्जुन
बांधता है मेरी देह
प्रिय है मुझे
कर्ण उन्मुक्त करता है मेरी आत्मा
झोंकता है मेरी अग्नि में
दे अपनी आहुति


कहा मैंने युधिष्ठिर
बँध के नहीं रह सकती मै
मेरी औरत को चाहिए
कर्ण, कृष्ण, अर्जुन,अन्य पुरुष
और तुम भी.

नाम चाहिए मुझे भी
पर यह त्रेता नहीं युधि
बंटवारा नहीं मुझे मंज़ूर
समयबद्ध अपने भोग का


मै पूर्ण हूँ
सब साथ हो जीवन में तभी.
अपूर्ण नियति हो मेरी
तब नाम छिन जाने दो

न रहो तुम मेरे जीवन में
पुरुष के नाम के बिना भी
रहेगा मेरा अस्तित्व
मेरे पूर्णत्व को चाहिए
कृष्ण, अर्जुन, कर्ण और अन्य पुरुष


कहा मैंने
बँध के नहीं रह सकती मै युधिष्ठिर
चाहो तो निकल जाओ
मेरी परिधि के बाहर























१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...