Thursday, August 29, 2013

एक, वायदा है निभा।

१. 

एक तस्वीर बराबर
ज़मीन का टुकड़ा 
औ 
दिल की कोठरी 
इतना ही,
सियासत मेरी।

२. 

तुमसे,
तक़रार तेरी निगाहों में। 
रक्ताभ कोनो को तनिक गाढ़ा, 
मुस्कान कर गहरी
जीती 
तुमने ही हर बाज़ी।

३. 

एक,
वायदा है निभा।
कमज़ोर कर न देना 
खुद मेरा होना,
है,
इसमे बस तेरी बदनामी 
और यही मंज़ूर
नहीं मुझको।

Tuesday, August 20, 2013

इतनी, बार लिखा तुमको।

१. 

इतनी,
बार लिखा तुमको।  
कि,
बस मेरी कविता में 
जिंदा तुम। 

२. 

एक,
अंत की तलाश में हूँ मैं। 
एक अंत,
जो कर दे परिभाषित 
मेरा होना अब तक। 

३. 

तुम,
जिसे चाहिए मेरा एक कोना। 
तुमने, 
ध्यान दिया ही नहीं 
लिखा है, बस अब तक तुमको। 

Thursday, August 15, 2013

मेरी चुप्पी भी, बस एक।

१. 

कोरा कागज़
लगता है,
बेहतर। 
लिख लिख 
मैं,
खराब करता, अपना ही, सफा। 

२. 

प्रेम परिधि 
गूंगी,
अच्छी। 
सुन, अनसुना 
कर,
बच निकलते, तुम।  

३. 

हर बार 
गरजता बादल,
या 
कोयल की कूक 
एक से ही, लगते मुझको।
बार बार 
की 
मेरी चुप्पी भी, बस एक। 



Wednesday, August 14, 2013

मेरी, उमर का ही हो गया है देश..

१. 

आज, 
बेतरह याद आती है 
जलेबी।
अगस्त पंद्रह और जलेबी 
एक ही थे 
बचपन में। 

देश,
भी अब जलेबी लगता। 
समझने में कठिन 
प्रिय पर, मेरा। 

२. 

मेरी,
उमर का ही हो गया है देश। 
पता है,
दिन अच्छे बीत गये। 

३. 

सरेंडर,
कर दिया है 
देश मेरे,
मैंने भी। 



Wednesday, August 7, 2013

फिर से हाज़िर हूँ हुज़ूर

ख़त्म हुआ
भ्रम,
मिट गई 
आशा,
अभिशप्त हैं पुनः जी उठने को। 

बहाने मिल ही 
जाते हैं 
ठहाकों को मेरे।

२. 

फिर से 
हाज़िर हूँ हुज़ूर 
आपके
दरवाज़े, खरीद लो 
कुछ 
मुस्कान।

मसीहा

१. कमाल है कि  तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं  सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि  मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...