१.
कमाल है कि
तुम गंध नहीं पा रहे
देख रहा हूं मैं
सड़ गया फ्यूचर।
२.
कमाल है कि
मसीहा तुम्हारा अब भी
सुन रहा हूं मैं
उसकी गालियां भद्दी।
३.
कमाल है कि
जश्न जीत का जी रहे तुम
जानता हूं मैं
लौ चेहरे पर, घर जलने की।
१.
कमाल है कि
तुम गंध नहीं पा रहे
देख रहा हूं मैं
सड़ गया फ्यूचर।
२.
कमाल है कि
मसीहा तुम्हारा अब भी
सुन रहा हूं मैं
उसकी गालियां भद्दी।
३.
कमाल है कि
जश्न जीत का जी रहे तुम
जानता हूं मैं
लौ चेहरे पर, घर जलने की।
१.
शून्य से अनंत तक, संख्या का गणित
शून्य से पहले समय
और
अनंत के बाद, ब्रह्मांड
तक
कल्पना ले नहीं जा पाता।
और नहीं बता पाता
कल्पना में हैं हम या हममें है कल्पना।
२.
धरती जितनी कितनी धरती
तुम जैसा नहीं कोई
पर, मुझ जैसे कितने मुझमें
परे मेरे भी, कितने मुझसे
मरे हुए, मारे या ज़िंदा
कितने फ्रेम में कितना कितना
मैं अब तक हुआ, हुआ है।
३.
जलकर, गलकर, सड़कर
कोशा-कोशा हो विलुप्त जब,
न कुछ बच जीवन
जब एक आईना पाता होगा,
क्या कुछ कह पाता होगा
कुछ भी, क्या बच जाता होगा
मन में जीवन के
रहित जीवन का खुलता है क्या कोई पन्ना
मौत का क्या होता है ख़ुद-होना।
कितना जानें
कितना मानें
ख़ुद को कितना पहचानें ।
कहाँ रेफ है
सेफ़ कहाँ है
बीता कितना
बचा कहाँ है
कितना कच्चा-सड़ा हुआ है
मौत मौत है
जीवन जीवन
युगल मध्य क्यूँ खड़ा हुआ है
मेरा मुझ तक पहुँच ना पाता
शैडो इतना बढ़ा हुआ है।
सौ अरब की अलग जाति के
भिन्न, एक-से जीव बने जो
एक धरा पर, एक रेख में, मरे हुए हैं
ज़िंदा हैं जो, मर जायेंगे
मरे हुए भी पड़े हुए हैं
फिर क्यूँ मैं हूँ
कब तक हूँ मैं
मेरे सीने में आकर यूँ
यह सवाल क्यूँ गड़े हुए हैं।
१. कमाल है कि तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...