समय के माप में,
नाप रहे हम दूरी।
समय निर्भर हमारी क्षमता पर
क्षमता का विस्तार तुम तक,
तुमसे दूरी क्षरण क्षमता का।
२.
न तरंग न पदार्थ रहे
चले वक्र जब भी।
न तुम हो सके
न बचा मैं
मिले हम जब भी।
३.
बात, शोर, उलाहना
मौन, चुप, बड़बड़ाना।
खत्म बात को कर ज़िंदा
जिंदगी बुनती नई कड़ी
मौत ख़त्म है संवाद का।
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