१.
शून्य से अनंत तक, संख्या का गणित
शून्य से पहले समय
और
अनंत के बाद, ब्रह्मांड
तक
कल्पना ले नहीं जा पाता।
और नहीं बता पाता
कल्पना में हैं हम या हममें है कल्पना।
२.
धरती जितनी कितनी धरती
तुम जैसा नहीं कोई
पर, मुझ जैसे कितने मुझमें
परे मेरे भी, कितने मुझसे
मरे हुए, मारे या ज़िंदा
कितने फ्रेम में कितना कितना
मैं अब तक हुआ, हुआ है।
३.
जलकर, गलकर, सड़कर
कोशा-कोशा हो विलुप्त जब,
न कुछ बच जीवन
जब एक आईना पाता होगा,
क्या कुछ कह पाता होगा
कुछ भी, क्या बच जाता होगा
मन में जीवन के
रहित जीवन का खुलता है क्या कोई पन्ना
मौत का क्या होता है ख़ुद-होना।
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