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Thursday, January 7, 2021

 1.

बीतते जा रहे हैं सामने से,

खेत दर खेत 

खेत जो परती रह गए हैं 

खेत जो सोना हो गए हैं 

लग रही है लू 

अब जबकि बसंत आने वाला है 

दिख रहे हैं साल पिछले जो बीते निरंतर 

दिख रहा है 


जी रहे थे जिसे वह भ्रम था. 

बीत गए बीस वर्ष.


2.

चुप चाप बदल गया साल 

साल,

जिसे 2020 होना था.


वैभव का, उत्थान का साल.

Tuesday, April 9, 2019

उम्र के साथ गिन रहा हूँ, गिनती

तो क्या करें, पता है, 
न तुम पढ़ते हो
न मैं लिखता हूँ
अब ऐसा कुछ भी नही करते 
जो साथ कभी करते थे
तो क्या करें,
इस ऊब का, जो पहले तो न थी.
उम्र के साथ गिन रहा हूँ, गिनती
मन ही मन बुदबुदा रहा हूँ पहाड़े
अतिरिक्त इसके क्या करें,
इस नई ऊब का.

ख्वाब जितने भी, कत्ल हुए.

1.
जब लिखा झूठ,
पढ़ा प्यार।
और इस तरह उम्र को गच्चा दिया।
2.
जब कहा सच,
सो गया।
ख्वाब जितने भी, कत्ल हुए।
3.
दोष दिया,
मर गया।
साथ जोहता रहा।

व्यतीत हो रहे हम।

1.
मौन घट रहा,
व्यतीत हो रहे हम।
2.
याद रहता नहीं कुछ,
बीत जाता है, प्यार।
3.
कुछ सिमटी, कुछ सिकुड़ी
रहती हैं मगर, चले जाने के बाद।

Tuesday, January 15, 2013


1.

क्या आसान समंदर होना / खुद की थाह नहीं मिलती।

2.

नहीं मिलता जवाब कोई / क्या आसान सरल होना 

3.

बात ख़त्म हुई / मौन स्थाई भाव 

Saturday, January 5, 2013

2012

1.

समय नहीं बीता / मैं हुआ, समय बीता।

2.

मुर्दा मुझमे, दफ्न न हुआ सच।

3.

हंस नहीं पाया / रोया तो बस रोना आया।

4.

तुम मिले, तुम खो गए / रहे तुम, खो गया मैं।

5.

मार दिया मैंने / छू भी न गया एहसास एक।

6.

आठ रस हुए पूरे / ज़िन्दगी नहीं एकाकी।

7.


शब्द हुए निष्फल / कलप कलप चीखा  मौन।


8.

दिन बीते, अँधेरा छाया रहा हरदम।







Wednesday, November 28, 2012

रात आधी

1.

एक रात काफी नहीं।
आधा प्याला, बचा हुआ,
ख़त्म होने को, आता नहीं।


2.

क्या वक़्त है, अभी बताओ तो। 
मरने से पहले या बाद का,
मुझे बोलना चाहिए या नहीं।


3.

रात आधी;
लिख सकते हो कविता
या कर सकते हो प्यार।       

Wednesday, August 31, 2011

लड़कपन मुझसे नहीं छूटा...

सफ़ेद कमल 
आज बाज़ार में देखा 
लड़कपन में,
फेक देता था .

हमेशा सोचा 
रंग पाता उन्हें लाल .

लड़कपन मुझसे नहीं छूटा...       

Wednesday, May 18, 2011

फिर उदास खुद को पाया हमने

देर तक
पौध हिलती रही
चाँद बड़ा होकर निकला
देर तक हवाओं को
दुलराया हमने

अल्लसुबह आज नींद तोड़ी हमने
तड़के फिर  खुद को भरमाया!

उदासी
सूर्य किरणों सी
छन छन के बही !
रौशनी लायी खालीपन फिर से
फिर उदास खुद को पाया हमने

Friday, May 6, 2011

कितनी ही बार 
उसी गुफा से गुज़रा हूँ मै 

स्याह हर बार स्याह
उतना ही अबूझ 

यातना की गुफा 
चाट जाती है हर बार ही 
प्राण- रस 
जीवन बाती 
बुझ जाती है

निगलता,वमन करता 
हर बार ही स्याह 
यातना की गुफा से 
जब भी गुजरता हूँ मै!



Thursday, May 5, 2011

क्यूँ कर/तुम्हे यकीं आये

क्यूँ कर 
तुम्हे यकीं आये
तुमने नहीं देखा 
स्याह-सफ़ेद/ रंगहीन कैनवास

हाँ या ना में नहीं सिमटी 
तेरी दुनिया !

कांच  सब कुछ है 
पारदर्शी के सिवा
झूठ नहीं सच का विलोम
प्रतिसच सच्चाई है 
तुम्हारी !

क्यूँ कर 
तुम्हे यकीं आये
कोई है 
नापता जो 
ब्रह्मांड दित्व में केवल.



Wednesday, May 4, 2011

सांस नहीं आती
जब तक न हो हवा थोड़ी विषैली

आदत नहीं रही
रहें साधारण !

विकल्प अब भी आता रहता है
अक्सर
बिछ जाओ या हो जाओ नीलाम
आदत हो गयी है थपेड़ो की
शांत हवा चुभती सी है

आज भी शुकून सा ही है
सर्प एक
कुंडली मारे बैठा




Tuesday, May 3, 2011

खुद पर दाग पसंद नहीं मुझको

रजनीकान्त
मेरा नाम!
मुझे नहीं पसंद

बोल या सुन नहीं बजता सितार!
यूँ सितार भी नहीं पसंद मुझे!
पसंद नहीं मुझे मेरा नाम

चाँद का अर्थ निकलता है

चाँद नहीं रहा मेरी पसंद
पसंद है सूर्य बनस्पत
चाँद के धब्बों
से उजाला होता है खंडित
नहीं चाहिए मुझे धब्बे खुद पर

चाँद नहीं
माँ भी कहती है मुझे शंकर
धुल धूसर से सना  है जीवन

माँ कहती है
पचा जाता हु मै जहर
जनता हु मै लेकिन बस में नहीं विष सारे

मन कहता है
रोक लो
विषम यह हलाहल

कंठ में एक दाग
हो  सकता है जीवनदायी

मै नहीं रोकता

ख़त्म हो जाने दो
फ़ैल जाने दो जहर
खुद पर दाग पसंद नहीं मुझको


Sunday, May 1, 2011

प्रेम रहा कल्पना केवल!

अजीब है !
प्रेम रहा कल्पना केवल
टूट जाना इसका केवल सच!

मदिर या मधुर 
किन्ही नयन से न संभाषण 
न स्पर्ष
न आलिंगन
वाचाल वा गोपन 
न कोई ध्वनि श्रृंगार  रहा
प्रेम रहा कल्पना केवल!Publish Post

चक्षु कोनो का तरल रहना
कंठ से सीने तक जलन केवल
नींद विस्मरण व स्वप्न मरण 
प्रेम रहा कल्पना केवल 
टूट जाना इसका केवल सच! 

Monday, April 25, 2011

अपनी कब्र में
माटी दे आया तो मै
न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों  हु .........

देखा तो था
धीरे धीरे मरना अपना
सोचना मेरा/ सांस आगामी दे दे जीवन
मुलाक़ात अगली रोक दे दम घुटना
देखा तो था अपनी सोच का गलत होते जाना
 न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों हु..........

मेरा विदा हो जाना खुद मुझसे
मेरी नियति में
देखना अपना कत्ल
छीज जाना सारा शुभ सत्व सारा
न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों हु............

Thursday, April 21, 2011

मुक्ति के लिए सदा ही शुक्रगुजार तेरा..........

लगता था मुझे डर
ख़ुशी के भाव में डूबते उतराते
डर लगता था मुझे
एक दिन आएगा दुःख उमड़ कर

दुःख उमड़ कर आएगा और सराबोर कर देगा  मुझे
दुःख का पहाड़  बढता जायेगा
बौना कर देगा मुझे.....

डर लगता था मुझे.
दुःख बादल सा ले उड़ेगा
दुःख ही धरती सा बरतेगा
अँधेरे सा नींद में उतर आएगा
दुःख दिन की रौशनी सा दमकेगा

सुख के समभाव के प्रतिलोम सा
दुःख की गठरी से डरता था मै हरदम .

आज जब सुख हो गया है अनुपस्थित
दुःख घटती  किसी घटना की तरह नज़र नहीं आता
पहाड़ सा दुःख नहीं दीखता
न दुःख के पहाड़ का बौना करते जाना मुझको
दुःख के बादलो का छाना
दुःख के समंदर में डूबते जाना

दुःख किसी घटना की तरह नहीं घटता .........


दुःख हो गया जीवन
दुःख की सांस परे दम घुट जायेगा
दुःख आज मुझसे परे कुछ भी तो नहीं
एकमेव है मै और दुःख

डर लगता था मुझे दुःख के बोझ तले दब जाने का
डर वाजिब न हुआ....
डर से मुक्ति मिल गयी है मुझे
मुक्ति के लिए सदा ही शुक्रगुजार तेरा



Tuesday, April 19, 2011

सुलग सुलग कर जलना
जलते रहना और सुलगना
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

मनोवेग की आंधी आकर
लप लप दे चिता अग्नि को
निजात्म का जलना अनवर

धुन्धुआना निज/धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

प्रखर वह्नी धमनी से परे
धरे रूप विकल अग्नि की
आतुर
भष्म करे भूत को

तुम तक पहुचे न तूफान यह
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

जलकर खत्म/ यही नियति है
फिर भी सुलगना धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल



Sunday, April 17, 2011

the intense most emotion

हालिया रिलीज़ एक मूवी का हवाला 
दे / कहते है लोग
 प्रतिशोध है शुद्ध वृत्ति 

कई महीनो से विचारा है मैंने
भाव घृणा का/ नफरत का 
{ जिसे जाना है मैंने कुछ समय ही पहले}
जनक है प्रतिशोध का.

यह सच है 
नफ़रत से बड़ा नहीं कोई भाव 
न बंधुत्व न प्रेम न सहजन्य 

घृणा एक विच्छोभ की तरह पसारता है/ खुद  को
एक के ऊपर एक आती आती जाती ही है नफ़रत की तरंग
सुनामी सा बढ़ कर छा जाती है 
ढहा देती है सारी सौजन्यता की दिवार
बह जाता है ज्ञान 

घृणा कर देती है नंगा
संस्कृति सब मिल भी नहीं रोक पाती 
क्षरण / मन का सब सुंदर

घृणा का ज्वार बीत जाने पर 
मन/ रह जाता है असक्त
शिव और सुंदर कुछ भी नहीं बचता 

सोचता हु अब फिर से 
काश मेरा भी एक इश्वर होता

सौंप देता उसको मै  यह सारी नफरत

मुक्त कर लेता खुद को
.................................
..................................







Friday, April 1, 2011

जीवन दीप जले न जले

बरस रहा है जमा गर्द, जमी धूल, थमा बादल
भीग के और भभका,   अदबदा जलता आंवा ;

बार बार तसल्ली , बार बार थपकी
टूट भी न रूकती सिसकी, रुके न आक्रंदन ;

      परिक्रांत मन न देखे,  बने अनबने राह नए 
जीवन दीप जले न जले, उठे न राख से अखनुख कोई.

Monday, February 1, 2010

ढूढ़ रहा हूँ
आगम निगम पुराण में
मेरे होने का कोई कारण

मन चाहता है
औचित्य हो मेरे  होने का
कारण कोई, प्रयत्न करू क्यों
रोकू खुद का खोना
       खुद का होना.

अपने आप चला जाता हूँ
खुद ही खुद को पाता हूँ
रुकता नहीं मन /मन को मारे
मार मन को
मन खो देता है
मेरे होने के सारे सूत्र.

१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...