हालिया रिलीज़ एक मूवी का हवाला
दे / कहते है लोग
प्रतिशोध है शुद्ध वृत्ति
कई महीनो से विचारा है मैंने
भाव घृणा का/ नफरत का
{ जिसे जाना है मैंने कुछ समय ही पहले}
जनक है प्रतिशोध का.
यह सच है
नफ़रत से बड़ा नहीं कोई भाव
न बंधुत्व न प्रेम न सहजन्य
घृणा एक विच्छोभ की तरह पसारता है/ खुद को
एक के ऊपर एक आती आती जाती ही है नफ़रत की तरंग
सुनामी सा बढ़ कर छा जाती है
ढहा देती है सारी सौजन्यता की दिवार
बह जाता है ज्ञान
घृणा कर देती है नंगा
संस्कृति सब मिल भी नहीं रोक पाती
क्षरण / मन का सब सुंदर
घृणा का ज्वार बीत जाने पर
मन/ रह जाता है असक्त
शिव और सुंदर कुछ भी नहीं बचता
सोचता हु अब फिर से
काश मेरा भी एक इश्वर होता
सौंप देता उसको मै यह सारी नफरत
मुक्त कर लेता खुद को
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