बरस रहा है जमा गर्द, जमी धूल, थमा बादल
भीग के और भभका, अदबदा जलता आंवा ;
बार बार तसल्ली , बार बार थपकी
टूट भी न रूकती सिसकी, रुके न आक्रंदन ;
परिक्रांत मन न देखे, बने अनबने राह नए
जीवन दीप जले न जले, उठे न राख से अखनुख कोई.
कितना जानें कितना मानें ख़ुद को कितना पहचानें । कहाँ रेफ है सेफ़ कहाँ है बीता कितना बचा कहाँ है कितना कच्चा-सड़ा हुआ है मौत मौत है ज...
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