Friday, April 1, 2011

जीवन दीप जले न जले

बरस रहा है जमा गर्द, जमी धूल, थमा बादल
भीग के और भभका,   अदबदा जलता आंवा ;

बार बार तसल्ली , बार बार थपकी
टूट भी न रूकती सिसकी, रुके न आक्रंदन ;

      परिक्रांत मन न देखे,  बने अनबने राह नए 
जीवन दीप जले न जले, उठे न राख से अखनुख कोई.

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