कितनी ही बार
उसी गुफा से गुज़रा हूँ मै
स्याह हर बार स्याह
उतना ही अबूझ
यातना की गुफा
चाट जाती है हर बार ही
प्राण- रस
जीवन बाती
बुझ जाती है
निगलता,वमन करता
हर बार ही स्याह
यातना की गुफा से
जब भी गुजरता हूँ मै!
१. कमाल है कि तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...
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