रेशा रेशा
रंग
उघाड़ता रहा,
बेरंग कर
कहानी में, फिट करना चाहा,
कुछ दिन लिखी
कहानी, मैंने
अधुरा किया खुद को .
कहानी, अधूरी
रेशा रेशा
उघाडती
अब, मुझको
कितना जानें कितना मानें ख़ुद को कितना पहचानें । कहाँ रेफ है सेफ़ कहाँ है बीता कितना बचा कहाँ है कितना कच्चा-सड़ा हुआ है मौत मौत है ज...
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