एक
काम सलीके से हो.
मैं चाहता हूँ,
प्लानिंग करके
मरुँ ,
मर गया अचानक
मुमकिन है,
सपनें मेरी आँखों में रह जाएं
और
आग बहती रहे नसों में मेरे,
बिना प्लानिंग
मर गया गर,
डर है
रह जाऊं यहीं
प्रेत सताए
तुम्हे रह रह .
१. समय के माप में, नाप रहे हम दूरी। समय निर्भर हमारी क्षमता पर क्षमता का विस्तार तुम तक, तुमसे दूरी क्षरण क्षमता का। २. न तरंग न पदार्थ रहे...
अब क्या कहूँ...
ReplyDeleteबहुत बहुत बहुत उम्दा रचना, बहुत सारगर्भित विचार..
सादर नमन...