देश तुमको प्यार नहीं करता
अब .
जिसे चाहो जी जान
उसका खंज़र रहता है
अदृश्य
बच के रहता हूँ हिमालय से
डरा रहता हूँ सिंध तुमसे
बंद कर देता हूँ
देश तुमको प्यार नहीं करता
अब
कितना जानें कितना मानें ख़ुद को कितना पहचानें । कहाँ रेफ है सेफ़ कहाँ है बीता कितना बचा कहाँ है कितना कच्चा-सड़ा हुआ है मौत मौत है ज...
adhoori se lag rahi hai.. aur pahli pankti jaise achanak s ekavita ko shuru karti hai.. theme ko samajhne mein tym lagta hai.. aajkal aap bahut complex way mein likh rahe hain.
ReplyDeleteआपकी बात से अब मई भी सहमत हु.. ये पुरानी कविता है.. आजकल लिखना हो कहाँ पा रहा
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