Wednesday, July 13, 2011

poems of delirium-4

उठ बैठी..


गिनने लगती है पोरों पर समय,
नहीं
मरने का समय नहीं आया,
हिसाब कहता है .

लाश उठ बैठी 
समय सवार है 
गर्दन पर मेरे  

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