Wednesday, December 24, 2014

नानी तुम नानी ही रहना।

मौसी मेरी बड़ी सयानी 
मौसी की मम्मी है नानी। 

मामा माँ बोले नानी को 
नानी बेटा बोले मुझको 
भाई हुआ जो मैं मामा का 
मामा बोलूं फिर मैं किसको। 

गड़बड़ झाला फिर ना करना 
नानी तुम नानी ही रहना। 


आओ खेले हम अब खेल

भैय्या देखो पापा आए 
राजू चाचा साथ हैं आए। 

चाचा के संग चाची आईं 
मुन्नी दीदी साथ है आई। 

मम्मी चाची करती मेल 
आओ खेले हम अब खेल। 

पापा कहते छोड़ो डॉल 
जाओ खेलो तुम फुटबॉल। 

Monday, December 22, 2014

जय जय भैय्या जय जय राम।

छत पर मेरे कौवे आते 
तरह तरह करतब दिखलाते। 

बोला मोटा कौवा एक दिन 
अच्छा नहीं लगता मेरे बिन 
बोला दुबला कौवा फिर 
लाओ खिलाओ दूध औ खीर। 

बोले कौवे सुबहो शाम 
जय जय भैय्या जय जय राम। 

जाना नहीं मुझे स्कूल

जाना नहीं मुझे स्कूल 
जाना नहीं मुझे स्कूल। 

अभी तो छोटा बच्चा हूँ 
उमर में काफी कच्चा हूँ 
बच्चा पर मैं सच्चा हूँ 
घर पर ही मैं अच्छा हूँ। 

जाना नहीं मुझे स्कूल 
जाना नहीं मुझे स्कूल। 

खेल कूद और गाना गाना 
हंसी ख़ुशी और मौज़ मनाना 
घर पर ही मैं अच्छा हूँ 
अभी तो छोटा बच्चा हूँ। 

जाना नहीं मुझे स्कूल 
जाना नहीं मुझे स्कूल। 

Sunday, December 21, 2014

नई कहानी खुद नानी की

ना राजा की ना रानी की 
नई कहानी खुद नानी की। 

नानी के थे काले बाल 
चिकने चिकने लम्बे बाल। 

नानी पीती थी खुब दूध 
भरा गिलास मलाई खूब। 

नानी से डरते थे नाना 
थरथर कापें बड़के मामा। 

मम्मी नानी से है डरती 
नानी प्यार मुझी से करती। 


  

नींद नहीं आती ख्वाब आते रहे दिन औ रात।

१. 
कब्रगाहों में दफ्न 
आशाओं के तेवर,
कुंडली मार छिप गयीं 
योजनाएं ख़ुशी की,
और काई पर फिसल गई 
तेरी हँसी 
बेतरतीब बिला वज़ह ख्वाब दर ख्वाब आती रहती है। 
परत दर परत जमते जाते हैं मुझ पर ख्वाब मेरे। 

२. 

नींद नहीं आती 
ख्वाब आते रहे दिन औ रात। 

३. 

देखी बचपन में भूली भूली भुतहा फिल्मो सी 
पता नहीं ख्वाब है या खुद मैं। 
हक़ कोई मुझे सवालात का ?
जवाब नहीं कोई 
पास मेरे। 

रस्म ज़िन्दगी निभाने की ?
मौत इर्द गिर्द 
पास मेरे। 


Saturday, December 13, 2014

गठरियों पर लदी गठरियाँ,

१.

मांग लूंगा पहली दुआ,
गर मर के खुदा मिला।

२.

इसके पहले कि मर जाए खुदा 
मन्नतें मांग लूँ, उम्र लम्बी हो। 

३. 

गठरियों पर लदी गठरियाँ, नहीं पता 
ढो रहा मैं दुनिया या दुनिया मुझको। 




Wednesday, October 22, 2014

बोझ यादों का भला।

१.

तर्क की गंध ही बारूदी 
हिसाब की लौ मद्धम। 
आग लगा दो हिसाब औ तर्क को। 

२.

नहीं बेहतर कुछ, रात की बारिश से 
अँधेरे में खुशबू और छपाछप। 
हो रात तो, करो बारिश। 

३. 

याद भी जलाती है 
स्वप्न झरते हैं यादों में। 
मन के खालीपन से बोझ यादों का भला। 




Monday, October 13, 2014

मतलब कोई नहीं।

१. 

सफर में  हैं 
मैं भी तुम भी। 
अंत तो है सफर का 
मतलब कोई नहीं। 

२.

अनुराग विराग सब 
तुमसे हैं। 
कुछ नहीं पार 
ज़िन्दगी के इस तरफ या उस तरफ। 

३. 

वार करो या सहो 
युद्ध नियति है। 
हमारा होना ही है 
जंग का होना। 



Sunday, September 28, 2014

बंद कर दो पढ़ना झूठा इतिहास।


मान लो, खुद चुन सको पैदा होने या मरने का समय। 
मान लो और चुनो एक समय खुद की पैदाइश का। 
चाहोगे पैदा होना किसी महान समय 
मसलन अशोक या अकबर के समय ?
मुझे जवाब पता है 
तुम नहीं चाहोगे चुनना मौत कलिंग या चित्तौड़ में। 
बंद कर दो पढ़ना झूठा इतिहास। 
और बंद कर दो वर्तमान को कलंकित करना। 




Wednesday, September 24, 2014

अपराध से काम तो नहीं खुश होना।

१. 

तमाम बातों के बाद भी 
बची रह जाती हैं ज़रूरी बातें। 
मुद्दतों बाद तुम्हारे जाने के,
बची रह जाती है, थोड़ी रात। 

२. 

दुहराना ज़िन्दगी को, नागवार। 
एक ही मंत्र का पुनरुच्चार 
अभिव्यक्ति का दुहराव
प्रेम का पुनः प्रेषण, नागवार। 

३. 

फ़र्क़ है हंसी और ख़ुशी में
हंसती हुई कामकाजी औरतें खुश तो नहीं। 
इस क्रूर समय में 
अपराध से काम तो नहीं खुश होना। 




Sunday, September 21, 2014

मैं चाहता हूँ

१. 

मैं चाहता हूँ 
शाम भी सुबह सा दिखूं 
पहचान सकूँ खुद को। 
मैं चाहता हूँ 
मैं मैं रहूँ, तुम तुम रहो, पूरे दिन। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
ठण्ड कम होते, परिंदे लौट जाएं 
वापस हों अपने घर अपने वतन। 
मैं चाहता हूँ 
मेरे अपने भी प्रवास से लौंटें। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
मूक स्वर, विस्मृत लिपि से परे 
टिक सकें भावनाएं। 
मैं चाहता हूँ 
कोई भी बोली, गाए प्रेम गीत ही।  


Saturday, September 20, 2014

मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी।

१. 

भ्रम है
रक्त लाल है, गाढ़ा या पतला।
लाल जब आपकी बारी हो 
हालत पतली, तो पीला।
बारी बारी सफ़ेद काला खून, बहुरूपिया। 

२. 

यूँ तो 
वर्षारंभ या अन्य दिन कुछ नहीं, दिन होने के सिवा।  
पर इंतज़ार रहता है 
वर्षांत का। 
इसी इंतज़ार में इज़ाज़त है, वर्ष भर खुद को घसीटने की। 

३. 

बचा नहीं 
बचपन न बचा यौवन। 
देह औ मन का ताप हुआ ठंडा 
फिर भी 
मन गिनता है, अघटित भी ज़िन्दगी। 


Friday, September 19, 2014

जबकि पता है मुझे

१ 

जबकि पता है मुझे 
शब्द से बेहतर, न जगह कोई, आशा हेतु
निज मन पाल रखा हूँ। 
साथ मेरे, बुझती जाती हैं आशाएं। 

२. 

जबकि पता है मुझे 
दिन है उजाला, बिन रोशनी का वक़्त, रात 
उदास मापांक से नापता मैं, वक़्त। 
वक़्त के बस दो चहरे, उदास या गुलज़ार। 

३. 

जबकि पता है मुझे 
शक्ल साम्य होना अचरज नहीं, इन दिनों 
एक ही साँचा गढ़े तमाम लोग। 
मेरे चहरे पर न चढ़ा कोई और चेहरा। 





Thursday, September 18, 2014

मैं चाहता हूँ-किस्से हों अजर अमर।

१.

मैं चाहता हूँ
खुले पल्लों की हों खिड़कियाँ
न केवल हवा, बादल भी चले आएं अंदर।
मैं चाहता हूँ 
बच्चे खेलें, गेंद आ जाए कभी कभी। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
नानीयां हों  उम्रदराज़
शाम से नींद तक चले किस्से। 
मैं चाहता हूँ 
किस्से हों अजर अमर। 

३. 

मैं चाहता हूँ 
बाद शब्द की मौत भी, लिखे कोई प्रेम पत्र 
ज़िंदा रहे चाहत, आशक्त -अनाशक्त। 
मैं चाहता हूँ 
प्रेम परे हो काव्य उम्र के। 


Wednesday, September 17, 2014

मुझे पता होता है


१.

अंदाज़े से परे
मेरा ही मन लगा रहा होता है, एक और अंदाज़ा। 
मुझे पता होता है
जब गलत होते हैं, सभी दांव मेरे। 

२. 

पता चले तुम्हे 
पूर्व इसके, बदल लेता हूँ मैं अपना चोला। 
पढ़ते रहते तुम चेहरा 
जब तुम्हारे अंतरतम, पलते हैं सपने मेरे। 

३.

क्या खूब आसान 
मेरी चाहत की बस्ती, बिना मोड़, विराम बिना।
योजनाओं की जद में  
खुद केंद्रित, सायास घाव करते, घात मेरे। 





Sunday, September 14, 2014

ज़िन्दगी बोर है, तुम्हारे बिना।

१. 

लम्बी बरसात 
बोर होती है, बिना चमक 
ज़िन्दगी बोर है, तुम्हारे बिना। 

२. 

अनवरत बरसात 
भिगो देती है धरती, धरती की हरयाली 
मन और सूख जाता, तुम्हारे बिना। 

३. 

बरसात कभी कभी 
दरकचा देती है, घर की दीवारें 
नींव ढहती मेरी, तुम्हारे बिना। 









Saturday, September 13, 2014

मैं चाहता हूँ

१. 

मैं चाहता हूँ 
अंत न हो अनंत का 
अंत के बाद भी बचा रहे कुछ तो। 
मैं चाहता हूँ 
ब्रह्माण्डांत, बसे एक और दुनिया। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
मृत्यु के साथ ख़त्म हो जीवन
मौत बार बार, न हो किसी के लिए। 
मैं चाहता हूँ
ज़िंदा रहने का हक़ हो, मरने तक। 

३. 

मैं चाहता हूँ
उजाला रहे, दिन के अस्तित्व परे 
काल गड़ना तक न सिमटे सूरज। 
मैं चाहता हूँ 
रात दिन न मुहताज हो कैलेंडर के।  

Friday, August 22, 2014

वक़्त

1.

वक़्त का एक मोड़ ऐसा भी 
परे जिसके, 

इंतज़ार बचता है वक़्त ख़त्म होने का। 


2.


न अनादि है न अनंत समय का विस्तार। 
भ्रम भर,
ख़त्म हो जाता है, शुरुआत के अनन्तर ही। 



3.

(अ)काल नहीं धरता रूप, भूत या वर्तमान।

भविष्यत् काल,
कुछ नहीं, बस मन की उड़ान। 

Wednesday, August 20, 2014

मैं चाहता हूँ

1.

मैं चाहता हूँ 
ख्वाब निर्जीव न हों,
उठान हो निर्भीक। 
मैं चाहता हूँ 
लौट आये बचपन। 

२. 

मैं चाहता हूँ 
लम्बाई बढ़े दिन की
चटक चमक हो उजाले की। 
मैं चाहता हूँ 
अँधेरे का दमन। 


3.


मैं चाहता हूँ 
पी सकूँ धुंआ, गर्द  कालिख 
समा जाए मुझी में जहर। 
मैं चाहता हूँ 
साफ़ हवा बहे अब से। 

Sunday, August 10, 2014

न कह सका अपनी, न सुना तेरी

न कह सका अपनी, न सुना तेरी
ज़िन्दगी, हम रह गये अपरिचित ही।

साथ होने से ही, हैं हम दोनों
अजीब है नहीं, हमारा होना ही।

चन्द सांसें दी हैं तुमने मुझको
एक तुमको मिला मुझसे, मायना ही।

नहीं साम्य कहीं, मध्य हम दोनों
तुम घटते गए, मैं बढ़ा ही। 












Saturday, August 2, 2014

बीत रहा मै...

 १. 

व्यर्थ,
या अन्यथा
बीत रहा मै। 

२. 

भरा पूरा,
ठसक ठसक 
रीत रहा मैं। 

३.

चलती नहीं,
ख़त्म होती ज़िन्दगी
टीस रहा मैं।  








Tuesday, July 22, 2014

अशेष नहीं, समय भी....

१.

अशेष नहीं, समय भी।  
ख़त्म हो,
वक़्त भी।

२.

न  पहले कुछ। 
न  बाद कुछ
मुझ तक, सिमटा समय।

३.

घूम फिर वहीं लौटे। 
नहीं कुछ और 
ज़िन्दगी का मक़सद, ज़िन्दगी।  






Saturday, May 17, 2014

कोई शीर्षक नहीं

1.

रिंग में मास्टर, बाहर शेर 
नए तमाशे ऐसे ही,
नकली मास्टर नकली शेर .

2.

बहुत तेज़ हवा है
आँचल बेहतर होता,
घर का दिया न बुझे, खुद के सैलाब में.

3.

आप वाकिफ हैं, है हमें भी पता 
जश्न में जले हैं 
अपने ही आशियाने भी .




Thursday, May 15, 2014

सोलह मई से एक दिन पहले

१. 

बड़ी अदा से,
बदल गए खुद को। 
तस्वीर मगर बासी ही लगा रखी है। 

२. 

तुम हो, फिर बीबी बच्चे तुम्हारे 
हमारे दिल पर 
हक़ तुम्हारा, खुला या छिपा। 

३. 

दो दिन,
भरम बनाए रखना। 
रोजी रोटी में लग जाऊँगा, दो दिन बाद।