Thursday, August 4, 2011

ख्वाब अनसुलझे

१. 

जेल,
सबसे बड़ी  
ख्वाब  अनसुलझे ,

बाँध रखा है
मरने भी नहीं देते. 

२.

मरीज़ मेरा 
न कहे में 
मेरे 

रोग 
पालता  है रोज़ 
नए, 
ख्वाब देखता है, 
अनसुलझे. 


11 comments:

  1. achha hai par thoda aur vistaar apekshit hai...kuchh chhhoot gaya ..

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  2. छूट गया है
    बहुत कुछ अब तो
    पकड़ पाता नहीं
    कविता, तुझसे

    रह जाता हूँ
    अधुरा
    हरदम.

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  3. छोटी कविताएँ बड़ी गहराई लिए होती हैं. ऐसी व्यथा कथा लिए जो दिखती नहीं है महसूस भर होती है. और रजनीकांत जी के प्रयास अच्छे लगे. विस्तार की अपेक्षा करना कवि के साथ अन्याय करना है. बस सावधानी से कदम दर कदम बढते जाएँ. शुभकामनाएँ .

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  4. बहुत बहुत शुक्रिया डाक्टर वत्सला .........

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  5. जन्माष्टमी की शुभ कामनाएँ।

    कल 23/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. बहुत बहुत धन्यवाद... आपका आभार...

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  7. bhaut hi acchi hai rachna.. ansuljhe khwabo ki...

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  8. अनसुलझे ख्वाबो की सुन्दर रचना.....

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  9. @ सागर एवं सुषमा ....... आप दोनों का बहुत बहुत आभार .......

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  10. संगीता जी .......... आपका बहुत बहुत आभार.....

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