Monday, August 15, 2011

ज़िन्दगी, तुमसे सीखा कुछ तो.......

था, उँगलियों में दर्द 
पैर  कुल्हाड़ी पर मारा 
पेट दर्द पर..... सर पर चोट
दर्द का इलाज 
बड़ा दर्द ले किया मैंने 
ज़िन्दगी, तुमसे सीखा  कुछ तो.......  

5 comments:

  1. well said..ek takleef ko bhoolne ke liye us sey badi takleef..zaher ki kaat zaher hi hai..

    ReplyDelete
  2. kya khoob likha hai apne...

    dard mitane ka ek naya andaaz...

    ReplyDelete
  3. दोस्त मुझे लगता है ज़िन्दगी ऐसे ही इलाज करती है.. आदमी में इतनी कुवत नहीं होती कि बिना नया दर्द पाए पुराने दर्द को भूल जाये.......

    ReplyDelete
  4. कविता में परिवर्तन किया गया है | यदि दोनों कविता एक साथ रक्खी जाय तो अभिव्यक्ति बहुत ही अर्थपूर्ण हो सकती है |

    ReplyDelete