Saturday, April 30, 2011

तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

प्यार होता है कोमल

इतना कि
पनपता है एक बार बस
सूख वा टूट जाता है खिलवाड़ से 


तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

मुझे पसंद है 
प्यार को पनपने देना 
अछूते कोनो को झंकृत करना
मुझे पसंद है तोड़ देना कोमल प्यार 

तुम कहते हो 
तुम से पहले भी कहा था कोई
उससे भी पहले कोई

कत्ल के कई इल्जाम है संवेदनाओ के 
मांगती हु मै स्थायित्व 
अंत से संबंधो के

मेरे मित्र 
तुम्हारी बात हो सकती है सच भी
मैंने नहीं कभी किया प्रेम
मेरे मित्र सच हो सकती है तुम्हारी बात भी

मैंने चाहा हमेशा 
करे न कोई प्यार कभी मुझे
प्रेम में सवांरते हो तुम केवल कोमलपन
तेरी भावना भर पाती है पोषण
सींचते  हो तुम ही ह्रदय का नम्र कोना

करते हो जब जब तुम प्रेम मुझे 
मै नहीं तुम ही होते हो निज दुनिया की धुरी

मेरे मित्र 
खिलवाड़ से सूखे/टूटे प्रेमोपरांत
बन पाते हो 
मेरे सखा 

मै चाहती हु 
तुमसे
तुमसे पहले कोई 
उससे पहले कोई












Friday, April 29, 2011

मै नहीं सह सकती/प्रेम विवाह

मै नहीं सह सकती
प्रेम विवाह

प्रेम देता है मुक्ति
बहने देता है
मेरे अन्दर की नदी
खुद तलाशे रास्तो पर

प्रेम के गोतों में
साथी रहते है मुक्त

क्रीडा सहचर-से मुक्त हम !

मुक्त प्रेम है मुक्ति मेरी

बांधता है विवाह

किनारों से बंधना हो नियति
तो
बंधने दो रीति से, रिवाजों से!

प्रेम विवाह
नहीं सह सकती मै

Thursday, April 28, 2011

नहीं चाह सकती तुम्हे/मन ओ मस्तिष्क से

मै एक नहीं !
मन ओ मस्तिष्क बांटता है मुझे.

मन ले जाता है
मुझे मेरे आदिम तक
सुन्दर बलिष्ठ विजेता...
नारी मन मेरा चाहे
जीत कर हासिल  करे
मुझे मेरा पुरुष

सभ्यता देती है मन को कई तह
कई तह मन के
चाहे पुरुष कई

मस्तिष्क  है पसंद मेरी

मन नहीं देखता  ज़रुरतो की लिस्ट
चाहे मस्तिष्क तुम्हे
तुम दे सकते हो नाम/धाम
मिलती है सुरक्षा 

मन चाहे तो  बेकाबू हो सकता है कभी कभी  
आवरण में !

मुझे पता है
नहीं चाह सकती तुम्हे
मन ओ मस्तिष्क से

न किसी और को





Wednesday, April 27, 2011

मै नहीं था लायक/जान पाता सच

तुम धरा हो

मेह के नेह से भीगे
तुम्हारे अंतर में
हलचल है नुकीले हल की भी
तुमसे पनपी है यह बाजरे  की फसल !

मै नहीं था लायक
जान पाता सच

जान पता/ बीज भर नहीं है अवयव
सृज़न को चाहिए तुम्हे
बीज के साथ हल ओ जल भी !
तुम धरा हो

मै नहीं था लायक
जान पाता सच....

Tuesday, April 26, 2011

माँगा तुमने था थोड़ी बारिश

sतुमने मांगी थोड़ी मिट्टी
कोई सौप गया सारी धरती

चाहा तुमने थोड़ी हवा 
कोई दे गया अपनी साँसे

जीवन के अनंत में 
तुम्ही बने किसी का अम्बर

हो तुम खुद अग्नि धर्मा
हवि तुम्हारी है भावना सबकी

माँगा तुमने था थोड़ी बारिश
तम्हारे हो गए मेरे  सावन

तुम हो गए पूरे
रह गए हम सब  रीते  

Monday, April 25, 2011

अपनी कब्र में
माटी दे आया तो मै
न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों  हु .........

देखा तो था
धीरे धीरे मरना अपना
सोचना मेरा/ सांस आगामी दे दे जीवन
मुलाक़ात अगली रोक दे दम घुटना
देखा तो था अपनी सोच का गलत होते जाना
 न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों हु..........

मेरा विदा हो जाना खुद मुझसे
मेरी नियति में
देखना अपना कत्ल
छीज जाना सारा शुभ सत्व सारा
न जाने फातिहा फिर भी नहीं पढता क्यों हु............

Thursday, April 21, 2011

मुक्ति के लिए सदा ही शुक्रगुजार तेरा..........

लगता था मुझे डर
ख़ुशी के भाव में डूबते उतराते
डर लगता था मुझे
एक दिन आएगा दुःख उमड़ कर

दुःख उमड़ कर आएगा और सराबोर कर देगा  मुझे
दुःख का पहाड़  बढता जायेगा
बौना कर देगा मुझे.....

डर लगता था मुझे.
दुःख बादल सा ले उड़ेगा
दुःख ही धरती सा बरतेगा
अँधेरे सा नींद में उतर आएगा
दुःख दिन की रौशनी सा दमकेगा

सुख के समभाव के प्रतिलोम सा
दुःख की गठरी से डरता था मै हरदम .

आज जब सुख हो गया है अनुपस्थित
दुःख घटती  किसी घटना की तरह नज़र नहीं आता
पहाड़ सा दुःख नहीं दीखता
न दुःख के पहाड़ का बौना करते जाना मुझको
दुःख के बादलो का छाना
दुःख के समंदर में डूबते जाना

दुःख किसी घटना की तरह नहीं घटता .........


दुःख हो गया जीवन
दुःख की सांस परे दम घुट जायेगा
दुःख आज मुझसे परे कुछ भी तो नहीं
एकमेव है मै और दुःख

डर लगता था मुझे दुःख के बोझ तले दब जाने का
डर वाजिब न हुआ....
डर से मुक्ति मिल गयी है मुझे
मुक्ति के लिए सदा ही शुक्रगुजार तेरा



Wednesday, April 20, 2011

कहा मैंने

बाँध के नहीं रख सकते मुझे
बँध के नहीं रहना मुझे.
युधिष्ठिर मैंने तो नहीं बाँधा तुम्हे

कृष्ण रहे सदा ही मेरे साथ
मेरे सखा, मेरे प्रिय की छाया
कृष्णा हूँ मै कृष्ण के ही नाते

पंचतत्व / पञ्च पतित्व
आधार है मेरे जीवन के
अलग अलग नहीं
एक साथ

बाँध नहीं सकते तुम
समय पर धर्म-रेखा

जी सकते हो भला
प्रथम वर्ष केवल जल पर
अगले साल केवल वायु

नाम दिया है तुमने
हक तुम्हारा भी है
मैंने माना ही सदा
दी तुमको इज्ज़त इस नाम की खातिर

नाम ही तो सब कुछ नहीं 'युधि'
तुम छिपा ले जाते हो
नपुंसत्व अपने सत्याचरण के सहारे
तुम्हारा सत्य नहीं देता मुझे संबल
तुम्हारा हो जीवनाधार !
तुम्हारे जीवनाधार से नहीं बाँध सकती मै अपनी नाव

तुम देते हो मुझे नाम
नाम से प्रिय है मुझे मेरा मै

तुम धर्मावतार हो
मै अग्निकन्या युधि
मेरी जीवनाग्नी को चाहिए
एकाधिक अर्जुन
बेध सके मुझको
बाँध ले मेरा प्रवाह
मेरे स्नेह को चाहिए पात्र नकुल/सहदेव का


तुम्हे प्रिय है सत्य तो सुनो युधि
कर्ण है मेरा प्रतिजीवन
अर्जुन और कर्ण
इन्ही के बीच हो सकता है बंटवारा

अर्जुन ने पा ली है मेरी देह
अर्जुन प्राप्य है मेरा
कर्ण प्रेय रहा है सदा
अगठित,कठिन कर्ण है/आकर्षण की धुरी
पुरुष रूप में प्रिय है मुझे कर्ण
सदा से/ अब भी

भोग मुझे अर्जुन
बांधता है मेरी देह
प्रिय है मुझे
कर्ण उन्मुक्त करता है मेरी आत्मा
झोंकता है मेरी अग्नि में
दे अपनी आहुति


कहा मैंने युधिष्ठिर
बँध के नहीं रह सकती मै
मेरी औरत को चाहिए
कर्ण, कृष्ण, अर्जुन,अन्य पुरुष
और तुम भी.

नाम चाहिए मुझे भी
पर यह त्रेता नहीं युधि
बंटवारा नहीं मुझे मंज़ूर
समयबद्ध अपने भोग का


मै पूर्ण हूँ
सब साथ हो जीवन में तभी.
अपूर्ण नियति हो मेरी
तब नाम छिन जाने दो

न रहो तुम मेरे जीवन में
पुरुष के नाम के बिना भी
रहेगा मेरा अस्तित्व
मेरे पूर्णत्व को चाहिए
कृष्ण, अर्जुन, कर्ण और अन्य पुरुष


कहा मैंने
बँध के नहीं रह सकती मै युधिष्ठिर
चाहो तो निकल जाओ
मेरी परिधि के बाहर























Tuesday, April 19, 2011

सुलग सुलग कर जलना
जलते रहना और सुलगना
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

मनोवेग की आंधी आकर
लप लप दे चिता अग्नि को
निजात्म का जलना अनवर

धुन्धुआना निज/धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

प्रखर वह्नी धमनी से परे
धरे रूप विकल अग्नि की
आतुर
भष्म करे भूत को

तुम तक पहुचे न तूफान यह
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

जलकर खत्म/ यही नियति है
फिर भी सुलगना धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल



Sunday, April 17, 2011

the intense most emotion

हालिया रिलीज़ एक मूवी का हवाला 
दे / कहते है लोग
 प्रतिशोध है शुद्ध वृत्ति 

कई महीनो से विचारा है मैंने
भाव घृणा का/ नफरत का 
{ जिसे जाना है मैंने कुछ समय ही पहले}
जनक है प्रतिशोध का.

यह सच है 
नफ़रत से बड़ा नहीं कोई भाव 
न बंधुत्व न प्रेम न सहजन्य 

घृणा एक विच्छोभ की तरह पसारता है/ खुद  को
एक के ऊपर एक आती आती जाती ही है नफ़रत की तरंग
सुनामी सा बढ़ कर छा जाती है 
ढहा देती है सारी सौजन्यता की दिवार
बह जाता है ज्ञान 

घृणा कर देती है नंगा
संस्कृति सब मिल भी नहीं रोक पाती 
क्षरण / मन का सब सुंदर

घृणा का ज्वार बीत जाने पर 
मन/ रह जाता है असक्त
शिव और सुंदर कुछ भी नहीं बचता 

सोचता हु अब फिर से 
काश मेरा भी एक इश्वर होता

सौंप देता उसको मै  यह सारी नफरत

मुक्त कर लेता खुद को
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Friday, April 1, 2011

जीवन दीप जले न जले

बरस रहा है जमा गर्द, जमी धूल, थमा बादल
भीग के और भभका,   अदबदा जलता आंवा ;

बार बार तसल्ली , बार बार थपकी
टूट भी न रूकती सिसकी, रुके न आक्रंदन ;

      परिक्रांत मन न देखे,  बने अनबने राह नए 
जीवन दीप जले न जले, उठे न राख से अखनुख कोई.