Wednesday, January 20, 2010

तुम हो तो यंकी आता है
कि
धरती है अभी
आसमा भी है

      तुम्हारे होने पर
      टिका है झरने का बहना
      कली चटकन का शोर
      भोर ओस का गीलापन

तुम हो तो मन  मानता है
रमा रहना
शिद्दत से जमा रहना
मन का मानना  कि
अकेला नहीं हु मै

         तुम रहना इर्द गिर्द
         कि सांसे टिकी रहती है अपनी जगह
         सांसो को टिके रहने दो अपने इर्द गिर्द

        



    

Thursday, January 14, 2010

शहर बनता, बसता,उजड़ता है मेरे भीतर
शहर को नापता मै खुद की खड्ड तले.

आँख के कोटरों  को चाभती काल जिह्वा
दृश्य परिधि पार से बांधती मुझको.

लम्ब, बेल,तिरछी कांटो से परखा गया मै
फातिहा पढ़ता हु मेरे इंतकाल का

धूल झरती रहे मेरे मकबरे पर
शहर कि सांस जहरीली मेरे फुफ्फुस तले.