Wednesday, July 17, 2013

गैरहाजिरी, रही उपस्थित हरदम

१. 

सुबह,
निराश हो गयी।
मैं निकला, कह 
लौट 
आऊँगा शाम ढले।
शाम,
रोज़ सहती मुझको।

२. 

तुम,
रूक नहीं पाए।
गिनती कर बंद,
वक़्त 
पसरा है लथपथ।
गैरहाजिरी,
रही उपस्थित हरदम।

३. 

सन्नाटा,
गहरी आवाज़ करता।
विरल खड्ड में,
आत्मा 
बिखरी, सिकुड़ी है।
उठान,
खोता अतित्व अपना।

Tuesday, July 16, 2013

१. 

जाने पहचाने छंद,
गीत  
बन जाते शोकगीत।
उदास तमाम पद 
लेते, 
ओढ़ मुझे।

२. 

हर नया रास्ता,
तुझ 
तक पहुच जाता।
उलझ गए हैं,
नक्शे 
ज़िन्दगी के।

३. 

बिखरी, बिसरी खुशियाँ,
पकड़ 
अब नहीं आती।
खाली हो गयी 
रेत 
भरी मुठ्ठी।








Monday, July 15, 2013

एक मित्र की कहानी का रूपांतरण

बर्फ पड़ती रही,
लगातार, बाहर 
बर्फ जमती रही,
अनवरत,
अन्दर।

सफ़ेद सड़को पर 
पसरी वीरानी 
दबे पांव 
घेर लेती है खालीपन मन का।
और तुम्हारा जाते जाना 
साथ रहना 
पास आस होना।

जमी बर्फ पिघला देती 
कुछ बिसरे फाग,
चंद रवींद्र गान।
सफ़ेद बर्फ झूठला देती 
कसौनी की शाम,
अनुराग के बासंती छींटें।

सफ़ेद बर्फ में,
दफना देती मैं 
अपनी नदी।
तुझतक मिलने तक 
बहती रही,
केवल तुझ तक ................
वक़्त है,
कि थिर वहीं।
तुम्हे बदलते देखा,
समय और मैंने।

ख्वाब रहे,
अजन्मे।
क़त्ल करता रहा,
जागता रहा मैं।

तुम हो,
कि प्रेय अब भी।
आस छोड़ी बस
ज़िन्दगी और मैंने।









Thursday, July 4, 2013

ढह जाना यूँ....

१.

ढह जाना
यूँ है कि,
खंडहर  दीखे नहीं

और  मलबा
समा जाए सीने में।

२.

टूटना
इस कदर,
कंहर के रह जाएं

न टूटे, न बिखरें
ख़त्म हो, सपना देखना।





  

एक ही, सुख

१.

एक ही,
सुख
दुःख नहीं अनपेक्षित।

२.

एक ही,
अभाव
कर सकना प्यार।

३.

एक ही,
दुःख
सुख नहीं सपना भी।