Tuesday, June 1, 2010

संजय के लिए ghost writing करते हुए बरसों पहले लिखा था इसे .

                 तुम्हारे नख चीरते है गहरा
                 काट चुटकी खुद गाल की
                 नहीं नाप पाता मै
               जख्म की गहराई

  तुम्हारे प्रेमाभिब्यक्ति ने
 सुन्न कर दिया है
मेरा सम्बेदना तंत्र.



 
                                             

Friday, May 28, 2010

DUKH..............

                                                                    १.
 सुख को कई उपमानो से
ब्यक्त कर सकता हूँ

दुःख को माप नहीं पाता भाषिक यन्त्र
पीड़ा  आंसुओ को छिपा ब्यक्त नहीं कर सजती अपनी उठान

दुःख स्मृति भर बक पाती है कविता

दुःख उन्छुआ निकल जाता है शब्द घेरों से
 रो नहीं सकने पर

दुःख रह जाता है अनकहा

Wednesday, March 10, 2010

man nahi manata-----

                                                              ३.

मन नहीं मानता
तुम सिमटी हो ख्वाबो तक केवल
ख्वाबो  से परे तुम कुछ भी नहीं

मन नहीं मानता
प्रेम स्वप्न मात्र है

मन चाहता है
तुम आ मिलो
तुम्हारे संग जोडू मै जीवन धागे.
                                               ४.

मन नहीं मानता

अंत है वाक्य का पूर्ण विराम
शब्द  खो देते है अर्थ
वाक्य का भी अंत है.

मन चाहता है
मूक अर्थ भी प्रेषित हो
न शब्दों  न वाक्यों पर रुके कहना
संवाद रहे बिन भाषा भी.

Monday, February 1, 2010

ढूढ़ रहा हूँ
आगम निगम पुराण में
मेरे होने का कोई कारण

मन चाहता है
औचित्य हो मेरे  होने का
कारण कोई, प्रयत्न करू क्यों
रोकू खुद का खोना
       खुद का होना.

अपने आप चला जाता हूँ
खुद ही खुद को पाता हूँ
रुकता नहीं मन /मन को मारे
मार मन को
मन खो देता है
मेरे होने के सारे सूत्र.

Wednesday, January 20, 2010

तुम हो तो यंकी आता है
कि
धरती है अभी
आसमा भी है

      तुम्हारे होने पर
      टिका है झरने का बहना
      कली चटकन का शोर
      भोर ओस का गीलापन

तुम हो तो मन  मानता है
रमा रहना
शिद्दत से जमा रहना
मन का मानना  कि
अकेला नहीं हु मै

         तुम रहना इर्द गिर्द
         कि सांसे टिकी रहती है अपनी जगह
         सांसो को टिके रहने दो अपने इर्द गिर्द

        



    

Thursday, January 14, 2010

शहर बनता, बसता,उजड़ता है मेरे भीतर
शहर को नापता मै खुद की खड्ड तले.

आँख के कोटरों  को चाभती काल जिह्वा
दृश्य परिधि पार से बांधती मुझको.

लम्ब, बेल,तिरछी कांटो से परखा गया मै
फातिहा पढ़ता हु मेरे इंतकाल का

धूल झरती रहे मेरे मकबरे पर
शहर कि सांस जहरीली मेरे फुफ्फुस तले.