Friday, July 22, 2011

मुंबई का धुआं


दो बार

कभी ज्यादा भी,
तलाशी लेने देता हूँ.

डर 
हर वक़्त बना रहता है,
खौफ 
चुभता है.

 कमजोर, मेरी आँखों को 
ज़रा तेज़ लगता है  
मुंबई का धुआं,

मै चाहता हूँ...

मैं चाहता हूँ 
लोच आ जाए,
मेरी चाल में थोड़ी 
तुम 
कुछ सीधा और चलने लगो.

मैं चाहता हूँ 
बना रहे संकोच मेरा,
आ जाए 
तुममें थोड़ी लज्जा . 

Thursday, July 21, 2011

poems of delirium -6.

क्या पहना होगा 
तुमने 
पैरों में,
मेरी किरिच पे चलते हुए... 

Wednesday, July 20, 2011

मैं चाहता हूँ,

एक 
काम सलीके से हो.

मैं चाहता हूँ,
प्लानिंग करके 
मरुँ ,

मर गया अचानक 
मुमकिन है,
सपनें मेरी आँखों में रह जाएं 
और 
आग बहती रहे नसों में मेरे,

बिना प्लानिंग 
मर गया गर,
डर है
रह जाऊं यहीं 

प्रेत सताए 
तुम्हे रह रह .

बम कितना बड़ा रहा होगा .

प्लास्टिक से ढँक
छिपाया था
और कहीं 
स्कूटर की डिग्गी,

बम 
कितना बड़ा रहा होगा .

अब तक उन्नीस मौतों 
और दर्ज़नों घायल के ?

जब नापोगे 
बम की ताकत 
तहकीकात करने को,
जोड़ दोगे क्या 
वो रातें 
बिना सोये जो मैंने काटी .

Tuesday, July 19, 2011

स्वप्न औ आग

पांच नहीं,
मेरे अवयव 
केवल  दो,

स्वप्न औ आग  
मेरी संरचना.

Monday, July 18, 2011

कोई तस्वीर तुम्हारी मेरे बगैर, मेरे जेहन में नहीं,














ढूंढ़ ढूंढ़ कर
इकठ्ठा किया सारी तसवीरें जेहन में जो भी,
तसवीरें जिनमें तुम थी 
मै साथ साथ ही था

कोई तस्वीर तुम्हारी 
मेरे बगैर, 
मेरे जेहन में नहीं,  

तमाम तस्वीरों की 
कतरन की,
खुद को काट 
अलग किया तुमसे,
मन ने जब खिंची होंगी तसवीरें, 
उन पलों को जिया फिर से.

याद नहीं 
तारीफ़ कभी की या नहीं
अनुमान लगता हूँ
निहारा होगा तुम्हे 
भले चुपके,
तुम्हारे  
केश, नासिका या भौहें   
कुछ तो हर बार भले लगे होंगे .

आज जब तस्वीरों को काटा
हर फ्रेम से अलग किया खुदको 
चंद तसवीरें जो थी जेहन 
हो गयी भद्दी,

मेरे बगैर 
कितनी बदसूरत हो तुम, 
घूरती 
खाली जगह, जिसे मैं भरता था कभी
खा जाने वाली चुड़ैल नज़रों से,
मेरे बगैर 
उन्ही तस्वीरों में 
असली सी 
चुड़ैल दिखती हो तुम .

उम्मीद है 
तुम जो देखो 
उन तस्वीरों से कटी मेरी कतरन 
तुम्हे लगे 
कैसे अजीब प्राणी से कर सकी तुम बात 
मुमकिन है 
खून पीता राक्षस
या भेड़िया 
नज़र मैं आऊं.

गनीमत है 
हमें कहना नहीं आता 
न तुम्हे न मुझे

पहले 
न मैंने कहा तुम जीवन सी लगती 
न तुमने, मैं आधार बन सकता हूँ 

गनीमत है
हम अब भी जाहिर न करेंगे 
खुद को
कोई न जानेगा 
चुड़ैल तुम या मै राक्षस .


सपने और सच में ज़रूरी क्या है.

अफीम की नदी 
पतवार सपनों की,
ज़िन्दगी की नाव   
न अंत न आदि को 
बहती हुई, 

मुंदी आँख से 
सावन का हरा 
रूप में छिपा जाती 
तुम,

ज़िन्दगी की किताब को रंगते  
सपने, 
आसन कर देते है  
मरना बेमौत, 
नाज़ से पाले 
कुत्ते जैसा  . 

सच 
आग के दरिया सा  
नसों में बहता, 
सच खुलता है  
खुली आँखों में 

देखते  
चेहरे पर चढ़े चहरे ,
गुलाबी लबों पर लिपटी, 
दुआ तमाम 
क़त्ल की मेरे,

सच 
ख़ुदकुशी के सिवा कुछ भी नहीं

सवाल गैरमुनासिब ही सही 
फिर भी 
वजूद से लिपटा -
सपने और सच में ज़रूरी क्या है.

अक्सर रोटी को चाँद सा पाया है .

चाँद दिखाई नहीं पड़ता  
भूख जब  बेतरह लगी 
दोस्त कहतें हैं 
चाँद सुन्दर हो जाता है 
जब रोटी सा लगने लगे,

जब भूख नहीं होती
अक्सर रोटी को चाँद सा पाया है .

Thursday, July 14, 2011

मुंबई


चिकोटा
मसल कर देखा 
कुरेदता रहा चमड़ी 
नाख़ून उखाड़े 
फिर 
सड़क पर सर दे मारा

हर कोशिस की 
पुरजोर जार रोने की 

मुंबई 
मुझको रो लेने देती

एक हिजड़ा क्रोध 
लंगड़ी हिंसा 
लहू में बहती रही

धुआं धुआं रोष पी 
मैनें 
फिर आज मज़े में रोटी खाई..

मुंबई 
माफ़ करना 
मेरी कायरता को... 

ज़िन्दगी ठहरी है टूटे धागे पर.



सफ़ेद
झक्क सफ़ेद खादी सी 
जिंदगी, 
बुन रहा था, 
समतल पठार सा 
सफेदी में सदा रंगा.

ध्यान भटका 
धोखा निगाहों को
रंगीन 
रेशम उलझ गया हाथ 
रिश्ता बुनना चाहा मैंने .

सतर टूट गयी 
लय टुटा 
रुक गया बुनना 
थम गया जीवन .

तुमने कहा  
बांध 
आगे बढ़ो   
टूट जाए  जो 
जोड़ लो उसको  
छिपा गाँठ 
मन के कोने 
टूटे रिश्तों को कर लो अपना   

बाँध कर देखा, 

एक ही गाँठ  
छिप न पायी 
मेरे चादर,
एक टुटा हुआ रिश्ता  
न निभा मुझसे 

खोल देता हूँ  
गाँठ 
मन पे पड़ी 
जोड़ता नहीं टुटा धागा 
छोड़ देता हूँ बुनना

ज़िन्दगी ठहरी है 
टूटे धागे पर. 


 


अधुरा किया खुद को .

रेशा रेशा 

रंग
उघाड़ता रहा,

बेरंग कर 
कहानी में, फिट करना चाहा,

कुछ दिन लिखी 
कहानी, मैंने
अधुरा किया खुद को .

कहानी, अधूरी  
रेशा रेशा  
उघाडती
अब, मुझको 

एक अरसा हुआ, नींद नहीं आई मुझको .

दिन, 
ख़ुदकुशी कर लेता है
रात ढलती नहीं 
उजाला नहीं होता,

तमाम तह 
बिछा 
संजोये अपने टुकड़े
ज़िन्दगी
क़त्ल रोज़ करती रही 

खौफ  
स्याप अंधेरों में नहीं सोने देता  

एक अरसा हुआ,
नींद नहीं आई 
मुझको . 

Wednesday, July 13, 2011

poems of delirium-5


ख़ामोशी पसरी 
सन्नाटा बिछा,
आती नहीं 
मुझ तक 
मेरी चिंखें, गूंगी 
मौत घटता नहीं क्यूँ 
सहसा  

poems of delirium-4

उठ बैठी..


गिनने लगती है पोरों पर समय,
नहीं
मरने का समय नहीं आया,
हिसाब कहता है .

लाश उठ बैठी 
समय सवार है 
गर्दन पर मेरे  

Tuesday, July 12, 2011

poems of delirium - 3

झुक
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को, 
थक गए थे कंधे - मुर्दा उम्मीदों को वहन करते ;
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को,
लाश फिसल गयी मेरे हाथों से
थक गए थे हाथ - अपने शव संस्कारों में ;
लाश पर 
अपनी 
नाचता रहा - नाचता रहा - नाचता रहा 
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को 
झुक 
कंधें आ गए मेरे हाथों में 
अपने हाथों
ढोता हूँ - अपने कंधे - अपनी लाशें  

poems of delirium-2

स्मरण नहीं,
बाज़ी  हममें, 
स्मरण नहीं 
कबसे चलती हुई

मेरा दांव भी      
मेरा जीवन
मेरा जीवन 
तुमने रखा है दांव, 
स्मरण नहीं, 
कबसे चलती हुई बाज़ी हममें .

रात जलती हुई-सुलगती हुई 
धुआं धुंआ रहता है दिन .

कुंद सिरे नाखून 
टूटे पंख घिसे दांत 
बुझे बुझे बोझिल डैने

कुरेद कुरेद खोद नोंच 
खुद को, 
याद से खुद को 
भूत से खुद को,

स्मरण नहीं द्वन्द कबसे चलता हुआ
स्मरण नहीं बाज़ी कबसे चलती हुई,
मेरा दांव मेरा जीवन
मेरे जीवन पर ही दांव तेरा

स्मरण नहीं कबसे मैं जलता हुआ....

Monday, July 11, 2011

देश तुमको प्यार नहीं करता / अब

बंद कर देता हूँ ,
देश तुमको  प्यार नहीं करता 
अब .

जिसे चाहो जी जान 
उसका खंज़र रहता है  
अदृश्य 
बच के रहता हूँ हिमालय से  
डरा रहता हूँ सिंध तुमसे 
बंद कर देता हूँ  
देश तुमको प्यार नहीं करता  
अब  

Wednesday, July 6, 2011

ताउम्र नफरत

नफरत,  
शिद्दत से 
कर पाते हो 
तुम 
हमसे
बेपनाह मुह्हबत की 
इज़ाज़त दी हमनें 

प्यार मानती हूँ 
 नफरत में 
ताउम्र नफरत ही रखो 
हमसे... 

Tuesday, July 5, 2011

मरता सावन

टपकता है
बूँद बूँद 
अनवरत
इस मौसम 
आग

मानसून 
बहा ले जाता है
स्व

धुला इस बारिश 
पुण्य 
तमाम उम्रों का,
तमाम कर्म
अग्निलीक  लील गई

शेषबिंदु है
यह, 
मरता सावन
विलुप्त केंद्र  
क्षय होता, 
मेरा मैं .


Monday, July 4, 2011

कब्र की पनाह/ तुम

क्षितिज , आसमां, धरती 
सब कठोर 
सब छाया 
अतीत के,

पीता हूँ साँसे 
खाता हूँ जिंदगी
कुरेदता हूँ 
सपनों की कतार
चबा रहा हूँ 
खुद को

सबको ढके सबको तोपे
एक आवाज़ 
एक छाया 

कोई नहीं यहाँ
कब्र की पनाह 
तुम   

तुम.1.

रीढ़ से चिपक 
रहता है 
जोंक 
हरदम हरवक्त

निज रक्त पीता
मैं

हर आह में 
छिपी 
तुम