Saturday, December 31, 2011

क्रोध आता है...

1.

क्षोभ होता है...

धकेल देता जब 
इन ढूहों से,कोई

गिराते, नहीं शिकवा !
  
ज़रा  उठान तक जाने देते,
गिरता भी, आसमान दिखता तो भला.

लौटता, उड़ते उड़ते...     

2.


क्रोध की परिणति है, रूदन.
बेबसी औ' क्रोध
करूं क्या इनका..


३.


ज़िन्दगी चलती है
आक्सीजन है हंसी.. 

   

सालान्त, बख्से मुझको अतीत से अपने.

लोग बाग
सवाल बना,जवाब सुझाते हैं मुझे.

शिक़वे भूल, गिले मिटाने का सुझाव,
सवाल, सालान्त को करें यादगार. 

नहीं याद,
नाटक औ पात्र 
याद नहीं अभिनव,

समय की तह या गर्त 
पनाह दिए हो भी गर,

भूलने, मिटानें में 
ताज़ा क्यूँ करूँ ज़ख्म    

सालान्त, बख्से मुझको 
अतीत से अपने. 
            

Friday, December 30, 2011

१.

दीवाल सा कुछ,
भरभरा,निरंतर रोके हुए!
खुद सपने अपने   
ले ले भागूं जब.

टूट रहे भ्रम मेरे
याकि,
सपनो में दगा, ख्वाब देते जाते......  

२.

मन के किनारों पर 
अक्सर,
दुःख के सीपी चुनते 
हंसी की चंद फुहारें
मोती बन लुप्त होते 

ख्वाब मेरे अपने,
सहते नहीं मनमानी मेरी..  
 

Thursday, December 22, 2011

सर्दी, इस मौसम......

१.
 धुप या न होना इसका,
उदास कर जाता है.
मन टटोलने लगता/ जगह खाली पासंग......

२.

ऊंचे बित्ता भर/
birawe    
फूटी बाली

मन करता है/
रूक जाऊं/
इन्हें पकने तक...

३.

रात अकेली, नीरव/
शोर केवल कुहरे का

मन करता है/
लपेटे हुए धुंध/
सोते रहें गंगा तीरे...

४.

सर्दी/ इस मौसम.
न केवल ठंढक.

सर्द, इसमौसम है/
मुरझाना मेरा.......

मैं........

१.
तमाम बातों का,
एकाध सिरा

कभी कभी पकड़ आता..........

समझ आता
अजनबी मैं  कितना /
रहने और जीने के तमाम नुस्खे.......
सुनता, जब जब
उदासी पैठती, रह रह
होता जाता हूँ कुछ और अकेला......

२.

कोना,
सावंली छाया का,
छू गयी मुझको.

दाग मैं लिए फिरता .

अँधेरी रात
अँधेरा काला
ये दुनिया रहती जिसमे
सह नहीं पाती मुझको.

नहीं चाहिए रौशनी इसको,
मुझे बर्दास्त नहीं, दाग मेरा.....

३.

किसी के रूकने तक,
मेरे लिए:
मैं नज़र आता नहीं,

मैं नज़र नहीं आता
रुकता नहीं, कोई,
मेरे लिए !!!!!! 




विदा हैदराबाद..............

१.
सुना तुमने,
मुझे हंसते,
मुस्कान आदत केवल.

हर एक बात
बिपरीत जाती हो,
मेरा बचाव हँसी..

२.

हैदराबाद,
लौटा दिया/ हाथ खाली

कुछेक दोस्त दिए,
 दिल को जोड़े.....

३.

चीरता सन्नाटा
अपनी साँसों में घुटा अटका
ज़िन्दगी रोके थी अब तक.

हैदराबाद, 
भरी तुमने फेफड़ों में गर्मी,
मिली वापस 
हंसी मुझको

शुक्रिया तेरा  !!!!!!!

Sunday, December 4, 2011

जानना चाहता नहीं............

जानना चाहता नहीं,

कई सवाल
उठते, गिरते
गिराते उठाते मुझको.

जानना चाहता नहीं,
मेरे शब्द, आवाज़; मेरे लिए या खिलाफ मेरे

यादें,
वजूद पर भारी; प्रत्याशा में गढ़ी यादें

जानना चाहता नहीं,
वजूद या गढ़ी यादों में ज़रूरी क्या है....