Tuesday, July 5, 2011

मरता सावन

टपकता है
बूँद बूँद 
अनवरत
इस मौसम 
आग

मानसून 
बहा ले जाता है
स्व

धुला इस बारिश 
पुण्य 
तमाम उम्रों का,
तमाम कर्म
अग्निलीक  लील गई

शेषबिंदु है
यह, 
मरता सावन
विलुप्त केंद्र  
क्षय होता, 
मेरा मैं .


2 comments:

  1. ab isme mai kya likhu.......

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  2. kuchh na kaho............
    kuchh bhi na kaho............
    mujhe pta hai bakwaas padh padh ke bore ho gaye ho......

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