Monday, July 11, 2011

देश तुमको प्यार नहीं करता / अब

बंद कर देता हूँ ,
देश तुमको  प्यार नहीं करता 
अब .

जिसे चाहो जी जान 
उसका खंज़र रहता है  
अदृश्य 
बच के रहता हूँ हिमालय से  
डरा रहता हूँ सिंध तुमसे 
बंद कर देता हूँ  
देश तुमको प्यार नहीं करता  
अब  

2 comments:

  1. adhoori se lag rahi hai.. aur pahli pankti jaise achanak s ekavita ko shuru karti hai.. theme ko samajhne mein tym lagta hai.. aajkal aap bahut complex way mein likh rahe hain.

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  2. आपकी बात से अब मई भी सहमत हु.. ये पुरानी कविता है.. आजकल लिखना हो कहाँ पा रहा

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