Tuesday, July 12, 2011

poems of delirium - 3

झुक
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को, 
थक गए थे कंधे - मुर्दा उम्मीदों को वहन करते ;
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को,
लाश फिसल गयी मेरे हाथों से
थक गए थे हाथ - अपने शव संस्कारों में ;
लाश पर 
अपनी 
नाचता रहा - नाचता रहा - नाचता रहा 
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को 
झुक 
कंधें आ गए मेरे हाथों में 
अपने हाथों
ढोता हूँ - अपने कंधे - अपनी लाशें  

4 comments:

  1. ye kavita bahut badiya hai....bahut khoobsoorati se aapne jeevan ki ek bahut kadawi vastvikta ko seedhe tour par likh diya hai...insaan apne kandhe par purane ghise pite kabaad ko liye chalta rahtaa hai..kyunki hamein uski aadat pad jaati hai

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  2. thank you..........................................................

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  3. Really a very nice poem,touching d heart. Congrates !

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