Thursday, May 19, 2011

मैं....

१.
तुमको पा
न खोया खुद को
तुम्हे खोकर भी
न मिला मैं मुझको !

खुद को , तुमको
सब ही खो दिया मैंने!

२.
रंगहीन है
प्रकाश.

स्याह या सफ़ेद
है
न होना या होना इसका

मैं
नहीं प्रिज्म
रंग नहीं मेरा जीवन

३.

खड़ा होना
दो पैरो पर
मेरा मनुष्य / करता विकास
चलना सीधे सीधे
खड़ा रहना सीधे सीधे
इसी बिंदु पर फ्रीज़ हूँ
मैं !
मैं बन चूका / इतिहास
विकास में बहुत पीछे.



Wednesday, May 18, 2011

दुःख-01

छू नहीं सकता
अँधेरा कसैला
हृदय के गिर्द !

छू नहीं सकता
गले को छीलती
सांस अटकी !

छू नहीं पाता
निपट लिपटा दुःख !

फिर उदास खुद को पाया हमने

देर तक
पौध हिलती रही
चाँद बड़ा होकर निकला
देर तक हवाओं को
दुलराया हमने

अल्लसुबह आज नींद तोड़ी हमने
तड़के फिर  खुद को भरमाया!

उदासी
सूर्य किरणों सी
छन छन के बही !
रौशनी लायी खालीपन फिर से
फिर उदास खुद को पाया हमने

Tuesday, May 17, 2011

समय

१-

ढल गया
ओस कतरन-सा 
समय 
हो संघनित
हो गया है ख़त्म
बिना छाप छोड़े अपनी

२-
समय  का एकायाम
इंतेज़ार
समय से परे 
मिलाप !

३-
रेल मुसाफिर सा
स्थिर, फिर भी विस्थापित
अक्सर आउटर पर खड़ा 
इंतज़ार बारी का
भागते पेड़ 
खिड़की से परे
वस्तुतः खड़े है वही
जैसे 
समय / गतिहीन सदा  


Monday, May 16, 2011

समय पर तीन कवितायेँ और...

३.

तुम बुनते रहे

सीख सीना
सिलें हैं मैंने
कई कोने !
समय को बना
गठ्ठर-सा
घुमती हूँ मै
पीठ  पर लादे

तुम बुनते रहे
समय के धागे
स्वीटर-सा
सीने से चिपका
तुमने पहन रखा है समय.

किसी घूरे पर फेंक
समय गठरी
मैं हो जाऊं हल्का
बदले मौसम में
तुम सहते रहो
समय की तपिश

Sunday, May 15, 2011

समय पर तीन कवितायेँ और.....

२-
सभी संभव, असंभव 
जोड़ता हूँ
समय से!

होनी के तमाम कोने
होने का नाभिक
नहीं  का भार
वजूद का हल्कापन
जोड़ता हूँ समय से!

मैं अघटित /
घटता है समय

Saturday, May 14, 2011

समय---तीन कवितायेँ और..!

१-
करता नट-क्रिया
समय,

नौशिखिया सा !

बाँध मन 
दो छोरों  पर
मै दर्शक हूँ
बिगड़ी ताल
साधते समय का!

विजड़ित मै
तनित मन
डगमगाता समय
मूल्य हीन नहीं,ये 
मनोरंजन! 



मसीहा

१. कमाल है कि  तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं  सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि  मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...