Wednesday, June 8, 2011

जलना आत्मा का.........

रक्त जल, 
बने कालिख
तब 
बंद हो शायद 
सुलग जलना आत्मा का ?

भष्म 
सब स्वप्न कर 
आहुति दी 
संकल्पों की ;
फिर भी 
धुआं धुआं
सा जलता क्यों है .

क्या 
सचमुच  है 
कोई इश्वर,
लेता हुआ बदला .

धुआं धुआं 
बन 
छोड़ रही है,
आत्मा 
मेरा संग 

एक दिन आएगा
धुआं 
 ख़त्म हो जायेगा धुंए की तरह  
साथ में मेरा मैं. 




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