Sunday, June 26, 2011

क्या कुछ 
कितना कुछ है 
मेरा.
 
ये आदमी, 
मेरी किस्मत बारह पंजों से नोचता 
शफ्फाक मेरे आईने से झांकता है मुझे,

ये औरत ,
तमाम मर्दों की तह में रख नीचा
अस्तित्व की नोंक से खरोंचती है मुझे,

क्या कुछ 
कितना कुछ है 
मेरा 

रक्त मेरा,
खौलता रहा - भाप बन उड़ता रहा
सराबोर तिक्त स्याह से करता है मुझे,

उन्छुआ ख्वाब ,
तमाम उम्र करता रहा पहरेदारी,
जल धू धू  एकाकी कर गया है मुझे,

क्या कुछ
कितना कुछ है 
मेरा

मेरा मैं , मेरी औरत,रक्त, ख्वाब मेरे 
कुछ भी 
क्या है मेरा.......




2 comments:

  1. bhayanak ko bahut dino bad ras ke rup me kavita me mahsus kiya hai.

    bhutha kavita ki nai vidha khoj rahe ho tum.

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  2. bahut khub
    tab to nayi nayi khoj par badhai bhi de do.

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