Wednesday, June 15, 2011

जब  कभी
बच के निकलती 
तुम
छतरी ताने 
बचते हुए बर्फ वा बारिश से

तुम पर उड़ेल देता 
कर बादल उल्टा,
बंद मट्ठी में लाता
चुटकी बर्फ तुम्हे चखने को 
तुम नाराज़ होती 

मै जानता 
दिखावा है नाराज़ होना..

तप्त मन को पड़े फफोले 
हुई बारिश जब जम कर
मन और तपा
मैं और जला 
टूटे ख्वाब पर नहीं आया रोना मुझको..



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