Tuesday, April 19, 2011

सुलग सुलग कर जलना
जलते रहना और सुलगना
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

मनोवेग की आंधी आकर
लप लप दे चिता अग्नि को
निजात्म का जलना अनवर

धुन्धुआना निज/धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

प्रखर वह्नी धमनी से परे
धरे रूप विकल अग्नि की
आतुर
भष्म करे भूत को

तुम तक पहुचे न तूफान यह
कितना कठिन है
कितना मुश्किल

जलकर खत्म/ यही नियति है
फिर भी सुलगना धीरे धीरे
कितना कठिन है
कितना मुश्किल



Sunday, April 17, 2011

the intense most emotion

हालिया रिलीज़ एक मूवी का हवाला 
दे / कहते है लोग
 प्रतिशोध है शुद्ध वृत्ति 

कई महीनो से विचारा है मैंने
भाव घृणा का/ नफरत का 
{ जिसे जाना है मैंने कुछ समय ही पहले}
जनक है प्रतिशोध का.

यह सच है 
नफ़रत से बड़ा नहीं कोई भाव 
न बंधुत्व न प्रेम न सहजन्य 

घृणा एक विच्छोभ की तरह पसारता है/ खुद  को
एक के ऊपर एक आती आती जाती ही है नफ़रत की तरंग
सुनामी सा बढ़ कर छा जाती है 
ढहा देती है सारी सौजन्यता की दिवार
बह जाता है ज्ञान 

घृणा कर देती है नंगा
संस्कृति सब मिल भी नहीं रोक पाती 
क्षरण / मन का सब सुंदर

घृणा का ज्वार बीत जाने पर 
मन/ रह जाता है असक्त
शिव और सुंदर कुछ भी नहीं बचता 

सोचता हु अब फिर से 
काश मेरा भी एक इश्वर होता

सौंप देता उसको मै  यह सारी नफरत

मुक्त कर लेता खुद को
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Friday, April 1, 2011

जीवन दीप जले न जले

बरस रहा है जमा गर्द, जमी धूल, थमा बादल
भीग के और भभका,   अदबदा जलता आंवा ;

बार बार तसल्ली , बार बार थपकी
टूट भी न रूकती सिसकी, रुके न आक्रंदन ;

      परिक्रांत मन न देखे,  बने अनबने राह नए 
जीवन दीप जले न जले, उठे न राख से अखनुख कोई.

Tuesday, March 29, 2011

दुःख २

दुःख का खुद में नहीं है महत्व

दुःख कर देता है सुन्न

सुख को बांटने , सुख को दिखाने
  सुख को पचाने के रास्ते बनाता आता है सुख

दुःख देता है जड़ता 
जड़ मन कर देता है
कलई दुःख की/ जीवन दर्पण में 
प्रतिबिम्बों के घेरे में दुःख ही दुःख 
साथी बनते है/ दुखी मन के 

Sunday, March 27, 2011

मै चाहता हु.3......

मै चाहता हूँ
चर्च न लिखे हमारी भूगोल पुस्तिका 

चर्च लिख  दे शायद 
धरती है चपटी

मै चाहता हु धरती रहे गोल हमेशा 
घूम फिर कर मिलने की गुंजाईश रहती है बाकी......

मै चाहता हु 2.....

मै चाहता हूँ 
 मृत्यु  आये न कभी  

ज़िन्दगी ठहरी हुई भी 
इंतज़ार करती है किसी विच्छोभ की

मृत्यु का आना इंतज़ार का कत्ल है

संभावनाओ की कल्पना
रोमांच की संभाव्यता है

मै चाहता हूँ 
अंत न हो संभावनाओ का.

मै चाहता हु

मै चाहता हूँ
बदल दू मुस्कान मोनालिसा 

चींख मारे चिग्घाड़  कर 
या हंस दे मुह बा कर
रहस्य आ कर सुलभ नहीं रहने देता मुस्कान

मै चाहता हूँ
मोनालिसा को अपनी जद में लाना .........

१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...