Thursday, June 25, 2026

मसीहा

१.

कमाल है कि 

तुम गंध नहीं पा रहे

देख रहा हूं मैं 

सड़ गया फ्यूचर।


२.

कमाल है कि 

मसीहा तुम्हारा अब भी

सुन रहा हूं मैं

उसकी गालियां भद्दी।


३.

कमाल है कि

जश्न जीत का जी रहे तुम

जानता हूं मैं

लौ चेहरे पर, घर जलने की।


Tuesday, June 23, 2026

ज़िन्दगी और मौत

१.
समय के माप में,
नाप रहे हम दूरी।
समय निर्भर हमारी क्षमता पर
क्षमता का विस्तार तुम तक,
तुमसे दूरी क्षरण क्षमता का।

२. 
न तरंग न पदार्थ रहे 
चले वक्र जब भी।
न तुम हो सके 
न बचा मैं 
मिले हम जब भी।

३.
बात, शोर, उलाहना 
मौन, चुप, बड़बड़ाना। 
खत्म बात को कर ज़िंदा
जिंदगी बुनती नई कड़ी 
मौत ख़त्म है संवाद का।







Sunday, June 21, 2026

संख्या का गणित

१.

शून्य से अनंत तक, संख्या का गणित

शून्य से पहले समय 

और

अनंत के बाद, ब्रह्मांड 

तक

कल्पना ले नहीं जा पाता। 

और नहीं बता पाता 

कल्पना में हैं हम या हममें है कल्पना।


२.

धरती जितनी कितनी धरती 

तुम जैसा नहीं कोई 

पर, मुझ जैसे कितने मुझमें 

परे मेरे भी, कितने मुझसे 

मरे हुए, मारे या ज़िंदा 

कितने फ्रेम में कितना कितना

मैं अब तक हुआ, हुआ है।


३.

जलकर, गलकर, सड़कर 

कोशा-कोशा हो विलुप्त जब,

न कुछ बच जीवन

जब एक आईना पाता होगा,

क्या कुछ कह पाता होगा 

कुछ भी, क्या बच जाता होगा

मन में जीवन के

 रहित जीवन का खुलता है क्या कोई पन्ना

मौत का क्या होता है ख़ुद-होना। 






 



फिर क्यूँ मैं हूँ.....

कितना जानें 

कितना मानें 

ख़ुद को कितना पहचानें ।


कहाँ रेफ है 

सेफ़ कहाँ है 

बीता कितना 

बचा कहाँ है 

कितना कच्चा-सड़ा हुआ है 

मौत मौत है 

जीवन जीवन 

युगल मध्य क्यूँ खड़ा हुआ है 

मेरा मुझ तक पहुँच ना पाता 

शैडो इतना बढ़ा हुआ है।


सौ अरब की अलग जाति के 

भिन्न, एक-से जीव बने जो 

एक धरा पर, एक रेख में, मरे हुए हैं 

ज़िंदा हैं जो, मर जायेंगे 

मरे हुए भी पड़े हुए हैं 

फिर क्यूँ मैं हूँ 

कब तक हूँ मैं 

मेरे सीने में आकर यूँ 

यह सवाल क्यूँ गड़े हुए हैं। 







Tuesday, January 23, 2024

१.

पूछो राम 

कब करेगा 

यह कुछ काम ।

२.

कर दे सबको 

रामम राम 

सत्य हो जाए राम का नाम 

उसके पहले बोलो इसको 

कर दे यह कुछ काम का काम ।

३.

इतना अब तुम कर दो राम 

बना दो सबके बिगड़े काम 

बोलो इसको 

करले काम 

कब तक बनें हम उल्लू राम ।






Saturday, January 1, 2022

तंत्र से जन घोंट कर बना वह ईसा है

बहुत लम्बे कान हैं, 

सुनते नहीं कुछ साजिश सिवा  

नुकीली लम्बी नाक है, 

सूंघते हैं साजिश 

आंखों से अँधा है  

अंधा तो अंधा है।  

नेता है गंदा है। 

चाक मध्य पीसा है 

जनता का कीसा है।  

पर 

पूज्य है, पूजनीय है 

महा है, महनीय है 

तंत्र से जन घोंट कर 

बना वह ईसा है 

अपना 

मसीहा है। 



Sunday, September 26, 2021

विषय- हिंदी-भाषा, पाठ-२ - विपरीत शब्द-युग्म

कक्षा - ०२, विषय- हिंदी-भाषा, पाठ-२ - विपरीत शब्द-युग्म 

१. सार्थक - निरर्थक

पुरानी किताब: सार्थक क्रिया, निरर्थक प्रयास। 

नई किताब: सार्थक जीत, निरर्थक विपक्ष।  

२. अर्थ-अनर्थ

पुरानी किताब: झाँसना - अर्थ, वैर-अनर्थ। 

नई किताब: जीत- अर्थ, हार- अनर्थ।  

३. उपयोगी -अनुपयोगी

पुरानी किताब: रामधुन उपयोगी, गांधी अनुपयोगी ।

नई किताब: दंगा उपयोगी, संविधान अनुपयोगी। 


 


Saturday, September 25, 2021

 ठहरी बात रही 

मेरी तेरी, पूर्ण है वचन उसका 

कहा अनकहा 

मसीहा स्वर है, शब्द है, भाव है 

हम ठहरे हैं, ठहरी बात पर.


2.

हमारा काम,

काम आ जाना 

मसीहा, वही काम है.


3.

राग लय विन्यास भिन्न नहीं 

मेरे तेरे 

हमारा अनुनाद, मसीहा संग. 


Thursday, September 23, 2021

अनायास मुस्कान

तीव्र प्रेय आकांक्षा 

कभी 

स्नायु दबाव

आस पास रही हो तुम

बिना कॉमा लिखी गई कविता 

पूर्ण विराम पाती तुम पर.


2.

तुम 

सर्वनाम हो

विस्थापित करती मेरी संज्ञा को.


3.

मेरी महत्ता

तुम विशेषण. 


Sunday, September 19, 2021

भाषा

एक भाषा

क्या होगा उसका जो ढोती है केवल झूठ.

याद रखी जायेगी, एक विलुप्त झूठी नदी की तरह 

या 

बहती रहेगी, ढोती हुई लोकतंत्र का सच 

मसीहा की जयकार 

संस्थाओं की लाश।  

बहती रहेगी क्या तब भी जब आडम्बर नहीं होंगे 

नहीं होंगे पंचसाला चुनाव। 

जब झूठ नहीं होगा फ़र्क़ सच से,

क्या ज़रुरत होगी भाषा की।   

Thursday, June 10, 2021

सर पर ताज हो

सर पर ताज हो 

मन भर आनाज हो 

काम नहीं काज हो 

साहेब सा  राज हो। 


चार चापलूस हों 

हज़ार जासूस हों 

कोटि कोटि भक्त हों 

बोटी हो रक्त हो 

कभी नहीं हार हो 

जय हो जयकार हो।  


नंगा हो भूका  हो  

मोटा हो सूखा हो 

शुन्य प्रतिकार हो 

अपनी सरकार हो।  






Tuesday, February 16, 2021

महान राष्ट्र यूं जन्म ले रहा है

अंधे कवियों ने लिखी महान कविताएं 

बहरे बीथोवेन ने सिम्फनी 

कटे पैर लोग चढ़ जाते हैं पहाड़।


नागरिक चाहते हैं

राष्ट्र भक्त होना। 

चाहते हैं,

न बदले कुछ भी  

रटे हैं, विकल्पहीनता।


महान राष्ट्र यूं जन्म ले रहा है।   

 

Saturday, February 13, 2021

तमाशा 

गुजर रहे वक़्त का नाम है, तमाशा।

गटर 

सार्वजनिक जीवन है, गटर। 

खेल 

तमाम रियाया संग हो रहा है, खेल। 

जेल 

बिना चहारदीवारी बिन दरवाज़ा जहालत की खुली जेल। 

नेता 

कौन ?

देश 

बेहतर है मौन। 



Tuesday, February 9, 2021

सांझ ढल जाना 
चलते चलते हो जाना रात,
यूं तो कोई कारण नहीं चिंता का 
गर रात ले आए विश्राम 
सूर्यास्त में खो गई रोशनी को स्वप्न में खोजने का हो उपक्रम.

सुबह की खातिर 
रात कट जाती है 
कई रात कट जाती है .

भय का कारण है अँधेरा 
जो दैव थोप देते हैं 
रात जो आसुरी माया हो 
रात जिसमे जिन्न ठग लेते हों ख्वाबों को चाहतों को 
रात. जिसकी चाहत हो रात के अनंत की. 

रात जिसे राजा ने कह रखा दिन है 
अँधेरा जिसे प्रकाश नाम दिया है 
ऐसे अँधेरे से डरता हूँ मैं 
इस रात से खूब डरता हूँ मैं .


एक विशाल नदी 
पश्चिम से पूरब 
पूरा उत्तर, अंश दक्षिण 
बहती है,
मेरे वक्तृव्य की 
मेरे ऐश्वर्य की। 

मेरे भाव भरे 
छत्तीस गुणों से सने 
भक्ति की चरम सुख 
सहज उपलब्ध हैं 
नदी के जल में। 

आकंठ डूब कर 
भक्ति का पान है 
मेरा गौरव है 
मेरा ज्ञान है। 

पश्चिम से पूरब तक उत्तर से मध्य क्षेत्र 
मेरा प्रसाद है बट रहा जो गलियों में तालों में खेतों में 
मेरी भक्ति की फसल देश भर लहलहाए
लौट कर तुम भी तो शरण मेरी आए। 

बजे मेरा डंका 
साकेत या लंका 
मसीहा हूँ मैं 
देश और कुछ नहीं मेरा विस्तार है। 




Monday, February 8, 2021

न ऊष्मा न विस्तार न तरल 

प्रेमहीन बोझिल।

नहीं दे सकता हूँ 

उष्णता संबंधों को,

उल्लास का आकाश,

संबंधों का उत्प्लावन 

प्रेम की तरलता 

धरा का आधार। 


पंचतत्वहीन मैं 

क्रियाहीन पड़ा हुआ 

समझता न सोचता हूँ 

व्यर्थ हो जाने का अनुभव आभास। 






Saturday, February 6, 2021

कहीं नहीं गए हम, 

न नर्क न स्वर्ग 

कहीं नहीं गए हम, 

मर गए और खो गए। 


2.

तकरीबन न के बराबर ख़ुशी 

बिलकुल नहीं दुःख, 

न अच्छा न बुरा 

मौत में कुछ तो ख़ास नहीं। 


3.

ध्वनि, वर्णमाला से परे 

भाव, जिनका नहीं कोई चित्र 

रंग नहीं, बेरंग नहीं , न बोला न रहे चुप 

मर गए, तुमको खबर नहीं।   

Friday, February 5, 2021

भय की चौखटे हैं
उस पार है निर्जन। 

मेरी सत्त्ता से परे  
तुम अकेले
तुम निर्बल
डांक नहीं सकते तुम मेरी सत्ता के द्वार 
दिन भर तुम जयकार 
रात करूँ मैं शिकार तुम्हारे विचलन का 
स्वस्थ चिंतन का 
स्वाधीन मनन का। 

तुम्हारी परिधि हूँ मैं 
तुम मेरी छाया हो 
हम साथ द्वन्द हैं 
तुम मेरी माया हो। 

तुम्हारे हीन का, भय का, गर्व का मैं उत्पाद हूँ 
तुम मेरे भक्त जन 
मैं तेरा भगवान् हूँ। 
 


Thursday, February 4, 2021

एक वह ज़िंदा है

समय नहीं समतल
इन दिनों रोज़ ही,
भहरा के गिर जाती है कोई प्रतिमा 
पूज्य कोई च्युत हो जाता है। 

जीवन और कुछ ठहर जाता है।

2.
इन दिनों रोज़ ही 
मर जाता है कोई चूहा 
कुछ और तेज़ रोती है बिल्ली 
भूके पेट सोते हैं बच्चे 
बाप कर बैठा है अनसन .

तमाम कस्बे की आखिरी ज़िद है 
बच्चों की भूख . 

3.
एक की शान 
उसके, बान की खातिर 
नदियों में जहर भर, बादल को कैद कर 
खेतों को कर लज्जित 
चर रहे हम फसल साथ की, सामर्थ्य की, करुणा की, प्रेम की 
प्रेम पर विश्वास की .

एक वह ज़िंदा है 
हम सब विजूका है.









Saturday, January 30, 2021

रहने दो हमको अपनी ही फुर्सत में

1. 

साधारण रह जाना,

परिचित बरामदों में रह जाना अनचिह्ना 

साधारण बात है 

और साधारण बातों की की तरह ही,

सहज। 


2. 

चकाचौंध की रौशनी पराई है, 

प्रसिद्धि की, सफलता की 

और  हम रह जाते चाँदनी की छाया में श्वेत वस्त्र भूतों से। 

कृत्रिम निर्मितियों की के प्रेत द्वार 

क्या ही ज़रूरी हैं। 


3. 

पहाड़ में पहाड़ी से, मैदान में मैदानी 

वंचित महत्त्व से, अर्थ की आभा से 

रहने दो हमको 

अपनी ही फुर्सत में। 



मसीहा

१. कमाल है कि  तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं  सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि  मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...