Friday, September 13, 2013

जनतंत्र घरानों से परे..........


१.

जब भी,
बढ़ जाता है, मेरा रक्तचाप 
माफ़ी मांगने लगते हैं, नेहरु। 
काश,
वही एक गलती न करते आप 
काश,
जनतंत्र पनपता, घरानों से परे।

२. 
  कभी,
नज़र पड़ जाती है, मेरी 
शुक्रिया अदा कर देता हूँ। 
लंगड़ा हुआ, पर 
जिंदा है, मेरे देश में 
अभी भी, राज़ वोटों का। 






No comments:

Post a Comment