Wednesday, May 11, 2011

कत्ल हो गया है उम्र का

समय नहीं चक्रीय

वर्तमान;
भूत भी
चंद खंडो में कटा 
रेखीय टुकड़ा है

समय 
स्थगित है
कटे किनारों के मध्य

कत्ल हो गया है उम्र का


Friday, May 6, 2011

कितनी ही बार 
उसी गुफा से गुज़रा हूँ मै 

स्याह हर बार स्याह
उतना ही अबूझ 

यातना की गुफा 
चाट जाती है हर बार ही 
प्राण- रस 
जीवन बाती 
बुझ जाती है

निगलता,वमन करता 
हर बार ही स्याह 
यातना की गुफा से 
जब भी गुजरता हूँ मै!



Thursday, May 5, 2011

क्यूँ कर/तुम्हे यकीं आये

क्यूँ कर 
तुम्हे यकीं आये
तुमने नहीं देखा 
स्याह-सफ़ेद/ रंगहीन कैनवास

हाँ या ना में नहीं सिमटी 
तेरी दुनिया !

कांच  सब कुछ है 
पारदर्शी के सिवा
झूठ नहीं सच का विलोम
प्रतिसच सच्चाई है 
तुम्हारी !

क्यूँ कर 
तुम्हे यकीं आये
कोई है 
नापता जो 
ब्रह्मांड दित्व में केवल.



Wednesday, May 4, 2011

सांस नहीं आती
जब तक न हो हवा थोड़ी विषैली

आदत नहीं रही
रहें साधारण !

विकल्प अब भी आता रहता है
अक्सर
बिछ जाओ या हो जाओ नीलाम
आदत हो गयी है थपेड़ो की
शांत हवा चुभती सी है

आज भी शुकून सा ही है
सर्प एक
कुंडली मारे बैठा




Tuesday, May 3, 2011

खुद पर दाग पसंद नहीं मुझको

रजनीकान्त
मेरा नाम!
मुझे नहीं पसंद

बोल या सुन नहीं बजता सितार!
यूँ सितार भी नहीं पसंद मुझे!
पसंद नहीं मुझे मेरा नाम

चाँद का अर्थ निकलता है

चाँद नहीं रहा मेरी पसंद
पसंद है सूर्य बनस्पत
चाँद के धब्बों
से उजाला होता है खंडित
नहीं चाहिए मुझे धब्बे खुद पर

चाँद नहीं
माँ भी कहती है मुझे शंकर
धुल धूसर से सना  है जीवन

माँ कहती है
पचा जाता हु मै जहर
जनता हु मै लेकिन बस में नहीं विष सारे

मन कहता है
रोक लो
विषम यह हलाहल

कंठ में एक दाग
हो  सकता है जीवनदायी

मै नहीं रोकता

ख़त्म हो जाने दो
फ़ैल जाने दो जहर
खुद पर दाग पसंद नहीं मुझको


Monday, May 2, 2011

मुझे प्रिय है /मेरे खिलोने !

न्यून की आदत है तुम्हे
तुम्हे पसंद है
कम-कमतर
खालीपन-खुलापन

मै संजोती हूँ
हर क्षण

जीवन का हर कोना,
दीवाल का रूखापन,
खालीपन मन का,
सजा के रखती हु मै.

खेल के स्पेश परे
खिलोने टूट भी,सजाते है जीवन
मुझे प्रिय है
मेरे खिलोने !

तुम जीते हो न्यून
खालीपन-खुलापन

मित्र मेरे!
नहीं रह सकते हम
एक छत तले

Sunday, May 1, 2011

प्रेम रहा कल्पना केवल!

अजीब है !
प्रेम रहा कल्पना केवल
टूट जाना इसका केवल सच!

मदिर या मधुर 
किन्ही नयन से न संभाषण 
न स्पर्ष
न आलिंगन
वाचाल वा गोपन 
न कोई ध्वनि श्रृंगार  रहा
प्रेम रहा कल्पना केवल!Publish Post

चक्षु कोनो का तरल रहना
कंठ से सीने तक जलन केवल
नींद विस्मरण व स्वप्न मरण 
प्रेम रहा कल्पना केवल 
टूट जाना इसका केवल सच! 

फिर क्यूँ मैं हूँ.....

कितना जानें  कितना मानें  ख़ुद को कितना पहचानें । कहाँ रेफ है  सेफ़ कहाँ है  बीता कितना  बचा कहाँ है  कितना कच्चा-सड़ा हुआ है  मौत मौत है  ज...