Friday, June 14, 2013

ख़याल कई

ख़याल कई,  
नहीं बांटे ॥  

बताया तो था, तुमको 
भोर की ओस, छूने की कशिश, 
चाहत मोर पंखों की, 
ख्वाब, नीले धुनों पर  थिरकन ॥ 

नहीं बताया कभी 
डर, झांकते कुँए में गिरने का 
भय, चलती ट्रेन से कूद जाने का 
दुह्स्वप्न आत्महत्या का  
तुमने भी तो छिपाया, मुझसे 

जो न, बांटो 
घट  जाता है ॥ 

1 comment:

  1. बहुत सुंदर। मैने ऐसे पढ़ा...

    ख़याल कई,
    नहीं बांटे ॥

    बताया तो था तुमको
    भोर की ओस छूने की कशिश,
    चाहत मोर पंखों की,
    ख्वाब, नीले धुनों पर थिरकन ॥

    नहीं बताया कभी
    डर, झांकते कुँए में गिरने का
    भय, चलती ट्रेन से कूद जाने का
    दुह्स्वप्न, आत्महत्या का ॥

    तुमने भी तो छिपाया,
    मुझसे
    जो न बांटो
    घट जाता है ॥

    ReplyDelete