Monday, June 10, 2013

बुनता रहा मैं 
गीत । 

मेरे अनजान 
ही, 
चखते रहे 
मुझको 
गीत मेरे । 

चीरा मुझको 
मुझी से, पेट भरा 
रक्तस्नान कर 
शुद्ध हुए 
गीते मेरे । 

उन्ही शब्दों ने जिया मुझको 
जिनकी चौखट 
आसरा थी मेरी । 

प्रेम 
निर्लज्ज 
घृणा 
लज्जा । 

तार तार 
खुली, बुनाई 
मेरी ॥ 

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