Thursday, June 13, 2013

शुरू के चन्द चक्कर

शुरू के चन्द चक्कर 
लोग कहते हैं, हैं 
मुश्किल । 

हर सुबह ही , बस 
दुश्वारी 
दिन कट जाता है ।  

कुछेक चक्कर बाद 
पाँव खुदबखुद खींचते खुद को 
दिन ढो लेता है. 

सुबह की दौड़ औ ज़िन्दगी 
धकेल रहे खुद को 
चंद  चक्कर बाद 
रुक जाता हूँ 
रोज़ 
मशीनी दौड़ से आजिज़ आ,

बेशर्म ज़िन्दगी 
हर सुबह 
वही तमाशा करती ॥ 

रोज़ ही दौड़ने जाता हूँ  
मैं ॥  

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