Sunday, January 22, 2012

मन चाहता है

1.

 मन चाहता है
 नीँद, भर रात 
 ख्वाब मेँ तुम । 
मन चाहता है 
 दिन भर, तुम केवल ॥ 

2. 

मन चाहता है 
 इन्द्रधनुष 
 चमक का, तेरी 
 रंग ओ गंध, तेरे होने के 
 मन चाहता है 
 इर्द-गिर्द तेरे, मैँ लट्टू ॥


3. 

मन चाहता है  
ओरहीन नभ, उड़ान का मेरे 
जा जुड़े, छोर से तेरे  
मन चाहता है 
 उड़ू मैँ, लट तेरी ॥

8 comments:

  1. वाह... बहुत ही बेहतरीन
    अंतिम बंद बहुत ही रोचक है...
    "ओरहीन नभ" ये शब्द मैंने अपने साहित्यिक सफ़र में पहली बार पढ़ा है. अनुपम कृति...
    सप्रेम अभिनन्दन...

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  2. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  3. कोमल भावो की अभिवयक्ति......

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  4. V@ manish सुषमा ..... बहुत बहुत शुक्रिया
    @ bhavana ...... limited desire ka karna bhi kya.......

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  5. बहुत सुन्दर सृजन, आभार.

    कृपया मेरी नवीनतम पोस्ट पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा .

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  6. most of your fatidic lines are amatory....and
    expression of ardent desire is really astonishing....

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