Thursday, September 8, 2011

गोल है धरती.....

१.


गोल है 
धरती, निश्चय ही .

हर राह
वहीँ ले जाती है ,
जिसके आगे कोई राह नहीं 


२.



मुश्किल है कहना 

तुम्हारी आवाज़ से
लगी ठोकर 
या 
भरम टुटा 
चलते रहने का .




३.






  1. रौशनी का पीछा,
  2. कहीं दूर तलक
  3. लाई है.. 

  4. वक़्त  पीठ पर मेरे 
  5. मुझको लिए चलता है..........   


4 comments:

  1. अद्भुत, रोचक और भावपूर्ण...
    "जिसके आगे कोई राह नहीं .... "
    सराहनीय रचना...

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  2. आद रजनीकांत जी ,
    आज अचानक आपके ब्लॉग पे आना हुआ .....
    नीचे देखा आप क्षणिकायें भी लिखते हैं ....

    आपसे अनुरोध है अपनी कुछ (१०,१२) क्षणिकायें मुझे 'सरस्वती-सुमन' पत्रिका के लिए दें ..जो की क्षणिका विशेषांक निकल रहा है ....
    यह अंक संग्रहणीय होगा ....
    साथ में अपना संक्षिप्त परिचय और तस्वीर भी ....
    इन्तजार रहेगा ....

    harkirathaqeer@gmail.com

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  3. "वक़्त पीठ पर मेरे, मुझको लिए चलता है..."
    रोचक विचार....

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