Monday, July 15, 2013

एक मित्र की कहानी का रूपांतरण

बर्फ पड़ती रही,
लगातार, बाहर 
बर्फ जमती रही,
अनवरत,
अन्दर।

सफ़ेद सड़को पर 
पसरी वीरानी 
दबे पांव 
घेर लेती है खालीपन मन का।
और तुम्हारा जाते जाना 
साथ रहना 
पास आस होना।

जमी बर्फ पिघला देती 
कुछ बिसरे फाग,
चंद रवींद्र गान।
सफ़ेद बर्फ झूठला देती 
कसौनी की शाम,
अनुराग के बासंती छींटें।

सफ़ेद बर्फ में,
दफना देती मैं 
अपनी नदी।
तुझतक मिलने तक 
बहती रही,
केवल तुझ तक ................

1 comment:

  1. hmm... meri kahani kavita ke roop mein aisi lag sakti hai ye andaza nahin tha .. aur ab is adhoori kavita ko poora bhi kariye

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