Sunday, April 17, 2011

the intense most emotion

हालिया रिलीज़ एक मूवी का हवाला 
दे / कहते है लोग
 प्रतिशोध है शुद्ध वृत्ति 

कई महीनो से विचारा है मैंने
भाव घृणा का/ नफरत का 
{ जिसे जाना है मैंने कुछ समय ही पहले}
जनक है प्रतिशोध का.

यह सच है 
नफ़रत से बड़ा नहीं कोई भाव 
न बंधुत्व न प्रेम न सहजन्य 

घृणा एक विच्छोभ की तरह पसारता है/ खुद  को
एक के ऊपर एक आती आती जाती ही है नफ़रत की तरंग
सुनामी सा बढ़ कर छा जाती है 
ढहा देती है सारी सौजन्यता की दिवार
बह जाता है ज्ञान 

घृणा कर देती है नंगा
संस्कृति सब मिल भी नहीं रोक पाती 
क्षरण / मन का सब सुंदर

घृणा का ज्वार बीत जाने पर 
मन/ रह जाता है असक्त
शिव और सुंदर कुछ भी नहीं बचता 

सोचता हु अब फिर से 
काश मेरा भी एक इश्वर होता

सौंप देता उसको मै  यह सारी नफरत

मुक्त कर लेता खुद को
.................................
..................................







4 comments:

  1. achhi hai..par grammatical errors dikh rahe ahi..plz corect them ..specially "ksh" or "chh"..

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  2. shukriya
    edit karneki kosis kar ke dekhta hu

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  3. its too good... every line is awesome and end is just superb...

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  4. thank you dear....
    but its pretty ordinary even by my own modest sense and standard of poetry. but yes its very personal and a medium to control my own emotions.
    its the first i wrote directly on screen without taking help of pen and pencil so kind of crude and devoid of art.

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