Monday, September 21, 2009

संजय की कविता और मेरा जवाब

प्रेम आदमी को निकम्मा ही नही कवि भी बना देता है।
संजय ने भी भावी पत्नी के प्यार में लिख डाली है कविता

प्रस्तुत है

" लम्हा लम्हा सोचता है /

लम्हा लम्हा चाहता है/

लम्हा लम्हा कहता है/

लम्हे लम्हे में तुम होती/
लम्हे लम्हे में तुम कहती/
लमे लम्हे में तुम हसती/

लम्हा लम्हा कहता है

हर लम्हे में में होता/
हर लम्हे में तुम होती/
लम्हे लम्हे में हम होते/

हर लमहा हमसे होता/
हर लमही यही कहता है/"[ सौजन्य से - संजय पाण्डेय ०९४७३२०९४४७]

पहले सोचा था केवल संजय को कहने दू
पर दिल कहा मानता है -
"तुक है/
तुम तक पहुच जाने में/
तुकांत है तुम तक पहुच जाना मेरा/

तुक से तुकांत तक के सफर /
तुक रहता है, तुक के चुक जाने तक
मेरे मिट जाने तक
तेरे खो जाने तक।

तुकांत है/ तुम तक पहुच जाना मेरा
तेरा मेरा , मेरा तेरा हो जाना "












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