Thursday, June 10, 2021

सर पर ताज हो

सर पर ताज हो 

मन भर आनाज हो 

काम नहीं काज हो 

साहेब सा  राज हो। 


चार चापलूस हों 

हज़ार जासूस हों 

कोटि कोटि भक्त हों 

बोटी हो रक्त हो 

कभी नहीं हार हो 

जय हो जयकार हो।  


नंगा हो भूका  हो  

मोटा हो सूखा हो 

शुन्य प्रतिकार हो 

अपनी सरकार हो।  






Tuesday, February 16, 2021

महान राष्ट्र यूं जन्म ले रहा है

अंधे कवियों ने लिखी महान कविताएं 

बहरे बीथोवेन ने सिम्फनी 

कटे पैर लोग चढ़ जाते हैं पहाड़।


नागरिक चाहते हैं

राष्ट्र भक्त होना। 

चाहते हैं,

न बदले कुछ भी  

रटे हैं, विकल्पहीनता।


महान राष्ट्र यूं जन्म ले रहा है।   

 

Saturday, February 13, 2021

तमाशा 

गुजर रहे वक़्त का नाम है, तमाशा।

गटर 

सार्वजनिक जीवन है, गटर। 

खेल 

तमाम रियाया संग हो रहा है, खेल। 

जेल 

बिना चहारदीवारी बिन दरवाज़ा जहालत की खुली जेल। 

नेता 

कौन ?

देश 

बेहतर है मौन। 



Tuesday, February 9, 2021

सांझ ढल जाना 
चलते चलते हो जाना रात,
यूं तो कोई कारण नहीं चिंता का 
गर रात ले आए विश्राम 
सूर्यास्त में खो गई रोशनी को स्वप्न में खोजने का हो उपक्रम.

सुबह की खातिर 
रात कट जाती है 
कई रात कट जाती है .

भय का कारण है अँधेरा 
जो दैव थोप देते हैं 
रात जो आसुरी माया हो 
रात जिसमे जिन्न ठग लेते हों ख्वाबों को चाहतों को 
रात. जिसकी चाहत हो रात के अनंत की. 

रात जिसे राजा ने कह रखा दिन है 
अँधेरा जिसे प्रकाश नाम दिया है 
ऐसे अँधेरे से डरता हूँ मैं 
इस रात से खूब डरता हूँ मैं .


एक विशाल नदी 
पश्चिम से पूरब 
पूरा उत्तर, अंश दक्षिण 
बहती है,
मेरे वक्तृव्य की 
मेरे ऐश्वर्य की। 

मेरे भाव भरे 
छत्तीस गुणों से सने 
भक्ति की चरम सुख 
सहज उपलब्ध हैं 
नदी के जल में। 

आकंठ डूब कर 
भक्ति का पान है 
मेरा गौरव है 
मेरा ज्ञान है। 

पश्चिम से पूरब तक उत्तर से मध्य क्षेत्र 
मेरा प्रसाद है बट रहा जो गलियों में तालों में खेतों में 
मेरी भक्ति की फसल देश भर लहलहाए
लौट कर तुम भी तो शरण मेरी आए। 

बजे मेरा डंका 
साकेत या लंका 
मसीहा हूँ मैं 
देश और कुछ नहीं मेरा विस्तार है। 




Monday, February 8, 2021

न ऊष्मा न विस्तार न तरल 

प्रेमहीन बोझिल।

नहीं दे सकता हूँ 

उष्णता संबंधों को,

उल्लास का आकाश,

संबंधों का उत्प्लावन 

प्रेम की तरलता 

धरा का आधार। 


पंचतत्वहीन मैं 

क्रियाहीन पड़ा हुआ 

समझता न सोचता हूँ 

व्यर्थ हो जाने का अनुभव आभास। 






Saturday, February 6, 2021

कहीं नहीं गए हम, 

न नर्क न स्वर्ग 

कहीं नहीं गए हम, 

मर गए और खो गए। 


2.

तकरीबन न के बराबर ख़ुशी 

बिलकुल नहीं दुःख, 

न अच्छा न बुरा 

मौत में कुछ तो ख़ास नहीं। 


3.

ध्वनि, वर्णमाला से परे 

भाव, जिनका नहीं कोई चित्र 

रंग नहीं, बेरंग नहीं , न बोला न रहे चुप 

मर गए, तुमको खबर नहीं।   

१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...