Monday, October 29, 2012

झाड झंखाड़ स्वप्न एक -- पार्ट टू

ख्वाब छलता हुआ,
चला आता है 
नींद झंझोड़े। 

बिखर जाने की, एक और परत बनती है
सोता जाता हूँ 
औ 
ख्वाब उगे आते हैं कन्धों से 
ख्वाब; पथरीले, लम्बे डैनों, नुकीले पंजों से 
नोच डालें हैं 
नींद मेरी,
मरती है धीमी मौत।

जलती आँखों 
ज़िन्दगी को निहारता मैं 
न हसरत, न लालसा कोई 
ख्वाब क़त्ल करते 
मेरा 
आहिस्ता आहिस्ता    


2 comments:

  1. baap re ... mere khyaal se ab aapko horror filmon k liye scriptwriter ban jana chahiye .. aur aise daraawane khwaab .... aapko kuchh lena chahiye. :P

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  2. idea hai to achchha.... aur vaie bhi abhi mumbai me hi hu to ajmaane me koi burai nahi.

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फिर क्यूँ मैं हूँ.....

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