Tuesday, July 12, 2011

poems of delirium - 3

झुक
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को, 
थक गए थे कंधे - मुर्दा उम्मीदों को वहन करते ;
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को,
लाश फिसल गयी मेरे हाथों से
थक गए थे हाथ - अपने शव संस्कारों में ;
लाश पर 
अपनी 
नाचता रहा - नाचता रहा - नाचता रहा 
बस छुआ मैंने 
अपने कन्धों को 
झुक 
कंधें आ गए मेरे हाथों में 
अपने हाथों
ढोता हूँ - अपने कंधे - अपनी लाशें  

poems of delirium-2

स्मरण नहीं,
बाज़ी  हममें, 
स्मरण नहीं 
कबसे चलती हुई

मेरा दांव भी      
मेरा जीवन
मेरा जीवन 
तुमने रखा है दांव, 
स्मरण नहीं, 
कबसे चलती हुई बाज़ी हममें .

रात जलती हुई-सुलगती हुई 
धुआं धुंआ रहता है दिन .

कुंद सिरे नाखून 
टूटे पंख घिसे दांत 
बुझे बुझे बोझिल डैने

कुरेद कुरेद खोद नोंच 
खुद को, 
याद से खुद को 
भूत से खुद को,

स्मरण नहीं द्वन्द कबसे चलता हुआ
स्मरण नहीं बाज़ी कबसे चलती हुई,
मेरा दांव मेरा जीवन
मेरे जीवन पर ही दांव तेरा

स्मरण नहीं कबसे मैं जलता हुआ....

Monday, July 11, 2011

देश तुमको प्यार नहीं करता / अब

बंद कर देता हूँ ,
देश तुमको  प्यार नहीं करता 
अब .

जिसे चाहो जी जान 
उसका खंज़र रहता है  
अदृश्य 
बच के रहता हूँ हिमालय से  
डरा रहता हूँ सिंध तुमसे 
बंद कर देता हूँ  
देश तुमको प्यार नहीं करता  
अब  

Wednesday, July 6, 2011

ताउम्र नफरत

नफरत,  
शिद्दत से 
कर पाते हो 
तुम 
हमसे
बेपनाह मुह्हबत की 
इज़ाज़त दी हमनें 

प्यार मानती हूँ 
 नफरत में 
ताउम्र नफरत ही रखो 
हमसे... 

Tuesday, July 5, 2011

मरता सावन

टपकता है
बूँद बूँद 
अनवरत
इस मौसम 
आग

मानसून 
बहा ले जाता है
स्व

धुला इस बारिश 
पुण्य 
तमाम उम्रों का,
तमाम कर्म
अग्निलीक  लील गई

शेषबिंदु है
यह, 
मरता सावन
विलुप्त केंद्र  
क्षय होता, 
मेरा मैं .


Monday, July 4, 2011

कब्र की पनाह/ तुम

क्षितिज , आसमां, धरती 
सब कठोर 
सब छाया 
अतीत के,

पीता हूँ साँसे 
खाता हूँ जिंदगी
कुरेदता हूँ 
सपनों की कतार
चबा रहा हूँ 
खुद को

सबको ढके सबको तोपे
एक आवाज़ 
एक छाया 

कोई नहीं यहाँ
कब्र की पनाह 
तुम   

तुम.1.

रीढ़ से चिपक 
रहता है 
जोंक 
हरदम हरवक्त

निज रक्त पीता
मैं

हर आह में 
छिपी 
तुम 

१. पूछो राम  कब करेगा  यह कुछ काम । २. कर दे सबको  रामम राम  सत्य हो जाए राम का नाम  उसके पहले बोलो इसको  कर दे यह कुछ काम का काम । ३. इतना ...