प्रेम आदमी को निकम्मा ही नही कवि भी बना देता है।
संजय ने भी भावी पत्नी के प्यार में लिख डाली है कविता
प्रस्तुत है
" लम्हा लम्हा सोचता है /
लम्हा लम्हा चाहता है/
लम्हा लम्हा कहता है/
लम्हे लम्हे में तुम होती/
लम्हे लम्हे में तुम कहती/
लमे लम्हे में तुम हसती/
लम्हा लम्हा कहता है
हर लम्हे में में होता/
हर लम्हे में तुम होती/
लम्हे लम्हे में हम होते/
हर लमहा हमसे होता/
हर लमही यही कहता है/"[ सौजन्य से - संजय पाण्डेय ०९४७३२०९४४७]
पहले सोचा था केवल संजय को कहने दू
पर दिल कहा मानता है -
"तुक है/
तुम तक पहुच जाने में/
तुकांत है तुम तक पहुच जाना मेरा/
तुक से तुकांत तक के सफर /
तुक रहता है, तुक के चुक जाने तक
मेरे मिट जाने तक
तेरे खो जाने तक।
तुकांत है/ तुम तक पहुच जाना मेरा
तेरा मेरा , मेरा तेरा हो जाना "
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