Thursday, November 22, 2012

आदि से अनंत तक, हम दोनों।

1.

उदासी रोती मुझ पर,
उदासी पर रोता मैं।
बन  गए, हम दोनों साथी।

 2.

चेहरे को ढक देता मैं,
नाम मिटा देते तुम।
हो गए, अनाम हम दोनों।

 3.

मेरा अंत नहीं होता,
तुम होते नहीं, दुबारा।
आदि से अनंत तक, हम दोनों।



   




Tuesday, November 20, 2012

मुझे आदत है, तेरे ठोकर की।

1.

समतल ज़मीन पर,
इक टुकड़ा पत्थर।
मुझे आदत है, तेरे ठोकर की।

2.

मिलना, मिलते रहना
मरने में मज़ा आ जाता है।

3.

डर कभी न था,
ज़िन्दगी तुझसे जुदा होने का।
अब प्यार भी नहीं करता, तुमको।





   




Thursday, November 8, 2012

मिलते हम


1.

मिलते हम,
तेज़ रोशनी, घुप्प अँधेरा 
दीख पड़ता नहीं, कुछ।
रोशनी,
छीन लेती 
तुमको, मुझसे।

2.

निर्वात, भारहीन 
मिलते मैं, तुम।
भार छीन लेता
तुमसे, मैं 
तुम, मुझसे 

3.

उंचाई 
अलग करती हमको,
गिरने का डर।
मुक्त, गिरते हुए,
मिलते हम।

Monday, November 5, 2012

तुम हो गए, मुक्त


तुम हो गए,
मुक्त 
भूल कर, मुझको 

बस साथ चलता रहा, 
मैं।

मुआफ़ न किया;
न भुला तुमको।

2.

हर हंसी बाद,
पैठी गहरी उदासी,
मौत आती है, आहिस्ता आहिस्ता 

3.


मुझे  याद नहीं,
मेरी इच्छाएं,
न पहली न आखिरी कोई,
मर गया क्या 
सचमुच मैं।   
 
4.

मेरा अंत, 
बता दो मुझको।

पता चले 
क्या अंत तक सहा तुमने, मुझको।

Monday, October 29, 2012

झाड झंखाड़ स्वप्न एक -- पार्ट टू

ख्वाब छलता हुआ,
चला आता है 
नींद झंझोड़े। 

बिखर जाने की, एक और परत बनती है
सोता जाता हूँ 
औ 
ख्वाब उगे आते हैं कन्धों से 
ख्वाब; पथरीले, लम्बे डैनों, नुकीले पंजों से 
नोच डालें हैं 
नींद मेरी,
मरती है धीमी मौत।

जलती आँखों 
ज़िन्दगी को निहारता मैं 
न हसरत, न लालसा कोई 
ख्वाब क़त्ल करते 
मेरा 
आहिस्ता आहिस्ता    


Tuesday, October 16, 2012

काटता है वक़्त

मनहूस मई  रात
खुद को मरा पाया उसने
हर रोज़,झखझोर खुद को देख लेता है
और रोज़ ही,
खुद को मरा पाता है,
काटता है वक़्त,
मौत को गिनते, बार बार  मारता है
हर बार ही, खुद को .

Thursday, October 4, 2012

झाड झंखाड़ स्वप्न एक .....01

उजाला बढ़ गया 
कल नींद साथ लाई,उजाला  
घनघोर उजाला
चमकदार, सफ़ेद, उजला, उजाला।
तुम पर साथ आ गए जैसे 
तुम आ ही गए साथ पर 
'आ गए जैसे' जैसी बात नहीं 
जैसे भरम हो मेरा 
तुम्हारे साथ ही आई एक परछाई, जैसे
 'जैसे ' कहना वाजिब है 
[न मेरे भरम का पता पक्का , न तेरे साथ की परछाई का ]
जैसे भरम हो मेरा ,तुम्हारे साथ ही,आई एक परछाई,जैसे 
लग पड़ी तुम गले मेरे,

और मै जलने लगा 

जलन से मेरे , जल न पाई परछाई 
अपने खुद से ढक रखा
छुपा रखा खुद से भी तुमने, परछाई 

चिपक  गई है तुमसे परछाई
नहीं कोई काम, मुझे परछाई से 
तुम  भी तो कहते हो, नहीं कोई काम तुमको, परछाई से 
पता नहीं मुझको
जगता कि सोता हूँ, खुद को ही छलता हूँ
देख देख खुद को ही,
जलता  दहकता हूँ
देख देख खुद को ही, हँसता हूँ,  हँसता हूँ 
अट्टहास 
हँसता हूँ 
हहाकर हँसता हूँ 
जलते हुए मुरख पर हंस कर बरसता हूँ 
हा हा हा हँसता हूँ 
झिम झिम बरसता हूँ,
भीगता नहीं हूँ 
तुम भीगते हो
नहीं भीगती है परछाई 

जलता बरसता हूँ 
हँसता हूँ 
अट्टहास 
    

मसीहा

१. कमाल है कि  तुम गंध नहीं पा रहे देख रहा हूं मैं  सड़ गया फ्यूचर। २. कमाल है कि  मसीहा तुम्हारा अब भी सुन रहा हूं मैं उसकी गालियां भद्दी। ३...